HomeBlogहिंदी साहित्य के ‘शिखर पुरुष’: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जीवन और अवदान [विस्तृत जीवनी]

हिंदी साहित्य के ‘शिखर पुरुष’: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जीवन और अवदान [विस्तृत जीवनी]

हिंदी साहित्य के इतिहास में यदि किसी एक व्यक्ति को ‘मील का पत्थर’ या ‘प्रकाश स्तंभ’ कहा जा सकता है, तो वे निस्संदेह आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं। 4 अक्टूबर 1884 को जन्मे शुक्ल जी केवल एक लेखक नहीं थे; वे एक संस्था थे। उन्होंने हिंदी साहित्य को वह वैज्ञानिक दृष्टि, तर्कशक्ति और व्यवस्थित ढांचा प्रदान किया, जिसके बिना आज हम हिंदी साहित्य के इतिहास की कल्पना भी नहीं कर सकते।

आलोचना के क्षेत्र में उन्हें ‘मुनिमार्ग का हिमायती’ कहा जाता है। उन्होंने भावनाओं को बुद्धि की कसौटी पर कसा और साहित्य को केवल मनोरंजन की वस्तु न मानकर उसे ‘जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब’ माना।

इस विस्तृत आलेख में हम उनके प्रारंभिक जीवन से लेकर, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के दिनों, उनकी कालजयी रचना ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, उनके निबंधों और उनकी उस वैज्ञानिक दृष्टि का विश्लेषण करेंगे जिसने उन्हें अमर बना दिया।


भाग 1: प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि

जन्म और परिवार:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 4 अक्टूबर 1884 (विक्रम संवत 1941) को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना नामक एक छोटे और समृद्ध गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

उनके पिता का नाम पं. चंद्रबली शुक्ल था, जो उस समय राजस्व विभाग में कानूनगो (Revenue Inspector) के पद पर कार्यरत थे। पिता की सरकारी नौकरी होने के कारण घर का माहौल अनुशासित और आर्थिक रूप से संपन्न था। उनकी माता एक धर्मपरायण और विदुषी महिला थीं, जिनका प्रभाव बालक रामचन्द्र के कोमल मन पर गहरा पड़ा।

बचपन और शिक्षा का माहौल:
शुक्ल जी का बचपन ग्रामीण परिवेश और बाद में शहरी बौद्धिकता के बीच गुजरा। उनके पिता फारसी और उर्दू के अच्छे जानकार थे। उस समय अदालती कामकाज की भाषा उर्दू-फारसी ही थी, इसलिए पिता चाहते थे कि बेटा भी उर्दू सीखे।

लेकिन बालक रामचन्द्र की रुचि शुरू से ही हिंदी और भारतीय संस्कृति की ओर थी। 1892 में जब उनके पिता का तबादला हमीरपुर जिले की राठ तहसील में हुआ, तो शुक्ल जी की प्रारंभिक शिक्षा वहीं शुरू हुई।

स्वाध्याय की शक्ति:
आचार्य शुक्ल की औपचारिक शिक्षा से अधिक महत्वपूर्ण उनका ‘स्वाध्याय’ (Self-study) था। उन्होंने लंदन मिशन स्कूल से फाइनल की परीक्षा पास की। वे आगे की पढ़ाई के लिए प्रयागराज (इलाहाबाद) और फिर काशी (वाराणसी) आए।

गणित में थोड़े कमजोर होने के कारण उनकी शिक्षा में कुछ बाधाएं आईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने घर पर ही रहकर योग्य शिक्षकों के सानिध्य में हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और उर्दू का गहन अध्ययन किया। इसी दौरान उन्होंने बांग्ला साहित्य का भी अध्ययन किया। यह वह समय था जब वे अपनी भविष्य की महानता की नींव रख रहे थे।


भाग 2: साहित्यिक यात्रा का आरंभ

शुक्ल जी का साहित्यिक जीवन बहुत कम उम्र में शुरू हो गया था। 17 वर्ष की अवस्था में उन्होंने अंग्रेजी में अपना पहला निबंध लिखा— “What India has to do” (भारत को क्या करना है)। यह निबंध उनकी परिपक्व सोच और राष्ट्रीय चेतना का प्रमाण था।

लेखन की शुरुआत:
हिंदी में उनकी शुरुआत एक कविता और ‘प्राचीन भारतीयों का पहिरावा’ नामक लेख से हुई। आनंद कादम्बिनी और नागरी प्रचारिणी पत्रिका में उनकी रचनाएं छपने लगीं।

मिर्जापुर का प्रभाव:
पिता की नियुक्ति मिर्जापुर में होने के कारण शुक्ल जी का संपर्क वहां के साहित्यिक माहौल से हुआ। मिर्जापुर उस समय हिंदी नवजागरण का एक केंद्र था, जहाँ ‘बद्री नारायण चौधरी प्रेमघन’ जैसे साहित्यकार रहते थे। प्रेमघन जी के संपर्क ने शुक्ल जी के साहित्यिक संस्कारों को निखारने में अहम भूमिका निभाई। कहा जाता है कि शुक्ल जी प्रेमघन जी के पुस्तकालय का खूब उपयोग करते थे।


भाग 3: हिंदी साहित्य का इतिहास (1929) – एक युगंतकारी घटना

आचार्य शुक्ल का सबसे बड़ा योगदान उनका ग्रंथ “हिंदी साहित्य का इतिहास” है। इसे हिंदी साहित्य का ‘बाइबल’ या ‘संविधान’ माना जाता है।

पृष्ठभूमि:
इससे पहले गार्सा द तासी, शिवसिंह सेंगर, जॉर्ज ग्रियर्सन और मिश्र बंधुओं ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने का प्रयास किया था। लेकिन वे ग्रंथ ‘इतिहास’ कम और ‘कवि-वृत्त-संग्रह’ (कवियों की सूची) अधिक थे। उनमें काल-विभाजन और प्रवृत्तियों के विश्लेषण का वैज्ञानिक आधार गायब था।

शुक्ल जी की वैज्ञानिक पद्धति (विधेयवादी पद्धति):
शुक्ल जी ने पहली बार “विधेयवादी पद्धति” (Positivist Approach) का प्रयोग किया। उन्होंने स्पष्ट कहा:

“जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है।”

इस परिभाषा ने साहित्य को देखने का नजरिया बदल दिया। उन्होंने साहित्य को राजा-महाराजाओं की प्रशंसा से निकालकर आम जनता की सोच और सामाजिक परिस्थितियों से जोड़ दिया।

काल विभाजन (Periodization):
शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य के 900 वर्षों के इतिहास को चार सुस्पष्ट कालखंडों में विभाजित किया, जो आज भी मान्य है:

  1. वीरगाथा काल (आदिकाल): संवत 1050 से 1375 तक।
    • शुक्ल जी ने इसे ‘वीरगाथा काल’ नाम दिया क्योंकि इस समय रासो काव्यों की प्रधानता थी। हालांकि बाद में हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे ‘आदिकाल’ कहना उचित माना, जिसे शुक्ल जी ने भी विकल्प के रूप में स्वीकार किया था।
  2. भक्ति काल (पूर्व मध्यकाल): संवत 1375 से 1700 तक।
    • इसे उन्होंने दो धाराओं में बांटा: निर्गुण धारा (ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी) और सगुण धारा (रामभक्ति और कृष्णभक्ति)। यह वर्गीकरण इतना वैज्ञानिक था कि आज तक इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं हो सका है।
  3. रीति काल (उत्तर मध्यकाल): संवत 1700 से 1900 तक।
    • यहाँ उन्होंने लक्षण ग्रंथों और श्रृंगारिकता की प्रधानता को रेखांकित किया।
  4. गद्य काल (आधुनिक काल): संवत 1900 से अब तक।
    • शुक्ल जी ने आधुनिक काल को ‘गद्य काल’ कहा क्योंकि गद्य का विकास इस युग की सबसे बड़ी घटना थी।

कवियों का मूल्यांकन:
शुक्ल जी ने कवियों को सिर्फ गिनाया नहीं, बल्कि उनकी ‘रैंकिंग’ तय की। उन्होंने तुलसीदास को हिंदी का सर्वश्रेष्ठ कवि माना। उनके अनुसार, तुलसी का ‘रामचरितमानस’ भारतीय जनता का कंठहार है और लोकधर्म की सबसे उम्दा व्याख्या है। वे कबीरदास के समाज सुधारक रूप का सम्मान करते थे लेकिन उनकी कविता में ‘काव्यत्व’ की कमी मानते थे। जायसी और सूरदास पर भी उन्होंने स्वतंत्र आलोचनात्मक ग्रंथ (त्रिवेणी) लिखे।


भाग 4: आलोचक रामचन्द्र शुक्ल

शुक्ल जी मूलतः एक आलोचक थे। हिंदी आलोचना को उन्होंने एक शास्त्र का रूप दिया। उनकी आलोचना दृष्टि के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. लोक-मंगल की अवधारणा:
शुक्ल जी के साहित्य-दर्शन का केंद्र बिंदु “लोक-मंगल” है। वे मानते थे कि सच्चा साहित्य वही है जो समाज का कल्याण करे। जो साहित्य केवल चमत्कार दिखाए या केवल मनोरंजन करे, वह उच्च कोटि का नहीं हो सकता। इसीलिए उन्होंने तुलसीदास (जो लोक-मंगल की साधना अवस्था के कवि हैं) को सूरदास (जो लोक-रंजन के कवि हैं) से ऊपर रखा।

2. रस मीमांसा:
शुक्ल जी भारतीय काव्यशास्त्र के मर्मज्ञ थे। उन्होंने ‘रस’ को काव्य की आत्मा माना। लेकिन उनकी रस-दृष्टि पुरानी पोथियों वाली नहीं थी। उन्होंने रस को जीवन के अनुभवों से जोड़ा। उन्होंने लिखा, “जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है।”
उनका ग्रंथ ‘रस मीमांसा’ उनके मरणोपरांत प्रकाशित हुआ, जो भारतीय सौंदर्यशास्त्र पर एक अद्वितीय कृति है।

3. छायावाद का विरोध और बाद में स्वीकार:
शुरुआत में शुक्ल जी ‘छायावाद’ (प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी) के रहस्यवाद और अत्यधिक लाक्षणिकता के विरोधी थे। उन्हें लगता था कि यह काव्य वास्तविकता से कटा हुआ है। लेकिन बाद में उन्होंने छायावाद के सौंदर्य और उसकी अभिव्यंजना शक्ति को पहचाना और उसका सटीक विश्लेषण किया।

4. विरोधों का सामंजस्य:
प्रख्यात मार्क्सवादी आलोचक डॉ. राम विलास शर्मा ने शुक्ल जी का मूल्यांकन करते हुए लिखा है कि शुक्ल जी ने सामंती और दरबारी साहित्य का जमकर विरोध किया। शुक्ल जी रीतिकालीन कवियों (जैसे बिहारी) की कलाकारी के प्रशंसक तो थे, लेकिन उन्हें जीवन-दृष्टि की कमी के कारण महान नहीं मानते थे। वे साहित्य को जनजीवन के करीब देखना चाहते थे।


भाग 5: निबंधकार शुक्ल (चिंतामणि का संसार)

यदि इतिहासकार के रूप में शुक्ल जी महान हैं, तो निबंधकार के रूप में वे अद्वितीय हैं। उनके निबंधों का संग्रह ‘चिंतामणि’ (चार भागों में) हिंदी गद्य की अनमोल धरोहर है।

निबंधों की शैली:
शुक्ल जी के निबंधों की सबसे बड़ी विशेषता है— बुद्धि और हृदय का संतुलन (Synthesis of Intellect and Emotion)। उनके निबंधों में विचार गुंथे हुए (Compact) होते हैं। एक भी शब्द फालतू नहीं होता।
उनके बारे में कहा जाता है कि वे “बातों को इस तरह कसते हैं जैसे कोई ईंटों की दीवार चुन रहा हो।”

मनोविकार संबंधी निबंध:
‘चिंतामणि’ (भाग-1) में संग्रहित उनके मनोविकार संबंधी निबंध विश्व साहित्य में दुर्लभ हैं। उन्होंने मानवीय भावनाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। उदाहरण के लिए:

  • उत्साह: “साहस और आनंद का मेल उत्साह है।”
  • करुणा: “करुणा दुखात्मक वर्ग में आने वाला मनोविकार है, पर यह दूसरों के दुःख से उत्पन्न होता है।”
  • श्रद्धा-भक्ति: उन्होंने श्रद्धा और प्रेम के अंतर को बहुत बारीकी से समझाया।
  • क्रोध: “क्रोध शांति भंग करने वाला मनोविकार है।”
  • लोभ और प्रीति: इसमें प्रेम के सूक्ष्म रूपों का वर्णन है।

कविता क्या है? (What is Poetry?):
यह उनका सबसे प्रसिद्ध सैद्धांतिक निबंध है। इसमें उन्होंने कविता की परिभाषा देते हुए कहा है कि कविता मनुष्य को स्वार्थ के संकुचित घेरे से बाहर निकालकर ‘भाव-योग’ की दशा में ले जाती है। यह निबंध साहित्य के विद्यार्थियों के लिए एक पाठ्य-पुस्तिका समान है।


भाग 6: अनुवाद और वैज्ञानिक दृष्टि

शुक्ल जी केवल साहित्य तक सीमित नहीं थे। वे एक आधुनिक और वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्ति थे। वे चाहते थे कि हिंदी भाषी समाज दुनिया के नए ज्ञान-विज्ञान से परिचित हो।

प्रमुख अनुवाद कार्य:

  1. विश्व प्रपंच (The Riddles of the Universe): उन्होंने जर्मन जीव वैज्ञानिक अर्न्स्ट हेकेल (Ernst Haeckel) की प्रसिद्ध पुस्तक का हिंदी अनुवाद किया। इसकी भूमिका में उन्होंने भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान की तुलना की। यह दर्शाता है कि उनकी पकड़ दर्शन और विज्ञान दोनों पर कितनी गहरी थी।
  2. बुद्ध चरित (The Light of Asia): एडविन अर्नोल्ड के महाकाव्य ‘द लाइट ऑफ एशिया’ का उन्होंने ब्रजभाषा काव्य में अनुवाद किया।
  3. शशांक: राखालदास बंद्योपाध्याय के बांग्ला उपन्यास का अनुवाद।
  4. मेगस्थनीज का भारत विवरण: इतिहास में उनकी रुचि का प्रमाण।

इन अनुवादों का उद्देश्य हिंदी पाठकों की बौद्धिक क्षुधा को शांत करना और हिंदी को ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाना था।


भाग 7: कथा साहित्य और कविता

यद्यपि शुक्ल जी की पहचान आलोचक के रूप में है, लेकिन उन्होंने सृजनात्मक साहित्य भी रचा।

कहानी: ग्यारह वर्ष का समय (1903)
उनकी कहानी ‘ग्यारह वर्ष का समय’ हिंदी की प्रारंभिक कहानियों में से एक मानी जाती है। कुछ विद्वान इसे हिंदी की पहली मौलिक कहानी भी मानते हैं (हालांकि ‘इंदुमती’ और ‘उसने कहा था’ भी इस दौड़ में हैं)। इस कहानी में शिल्प और संवेदना का नया प्रयोग था।

कविता:
उनका कविता संग्रह ‘मधुश्रोत’ नाम से प्रकाशित है। उनकी कविताओं में उनके बचपन की यादें, विंध्य क्षेत्र की पहाड़ियां, झरने, खेत और प्रकृति का सुंदर चित्रण मिलता है। वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में लिखते थे। लेकिन बाद में आलोचना के भारी काम के चलते उनकी कवि-प्रतिभा पीछे छूट गई।


भाग 8: अध्यापन और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU)

शुक्ल जी का जीवन एक शिक्षक का जीवन था।
शुरुआत में उन्होंने मिशन स्कूल में ड्राइंग मास्टर (चित्रकला अध्यापक) के रूप में कार्य किया। वे चित्रकला में भी निपुण थे और अपना घर उन्होंने खुद डिजाइन किया था।

नागरी प्रचारिणी सभा:
उनकी विद्वता को देखकर काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें ‘हिंदी शब्दसागर’ (Hindi Dictionary) के संपादन कार्य के लिए आमंत्रित किया। यह एक ऐतिहासिक कार्य था। इसी शब्दसागर की भूमिका के रूप में उन्होंने ‘हिंदी साहित्य का विकास’ लिखा, जो बाद में परिवर्धित होकर ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ बना।

बी.एच.यू. में नियुक्ति:
महामना मदन मोहन मालवीय जी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में हिंदी विभाग में प्राध्यापक नियुक्त किया।
1937 में मुंशी प्रेमचंद के निधन और बाबू श्यामसुंदर दास के अवकाश लेने के बाद, शुक्ल जी हिंदी विभागाध्यक्ष बने। 1941 में अपनी मृत्यु तक वे इसी पद पर सुशोभित रहे।

छात्रों के बीच वे बेहद सम्मानित थे। वे अनुशासनप्रिय और गंभीर स्वभाव के थे, लेकिन कक्षा में पढ़ाते समय वे विषय में डूब जाते थे। उनकी हंसी मशहूर थी—वे बहुत कम हंसते थे, लेकिन जब हंसते थे तो पूरा माहौल हल्का हो जाता था।


भाग 9: व्यक्तिगत जीवन और विचार

परिवार:
शुक्ल जी का विवाह सावित्री देवी से हुआ था। उनका भरा-पूरा परिवार था। उनके दो पुत्र—केशव चंद्र और गोकुल चंद्र, और तीन पुत्रियां—दुर्गावती, विद्या और कमला थीं। उनके पुत्र गोकुल चंद्र शुक्ल ने भी बाद में उनके कार्यों को आगे बढ़ाया।

व्यक्तित्व:
शुक्ल जी खांटी भारतीय थे। धोती, कुर्ता और कंधे पर अंगोछा—यह उनकी पहचान थी। वे स्वाभिमानी थे। एक बार किसी अंग्रेज अधिकारी ने उनसे कुछ अपमानजनक कहा, तो शुक्ल जी ने नौकरी की परवाह किए बिना उसे करारा जवाब दिया था।

साम्राज्यवाद विरोध:
शुक्ल जी ब्रिटिश शासन के विरोधी थे। 1921 में उन्होंने “Non-co-operation and Non-mercantile Classes of India” (असहयोग और भारत के गैर-व्यापारी वर्ग) नामक लेख लिखा। इसमें उन्होंने भारत के औपनिवेशिक शोषण का आर्थिक विश्लेषण किया। वे मानते थे कि अंग्रेजों ने भारत की रीढ़ तोड़ दी है।


भाग 10: विरासत और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान

2 फरवरी 1941 को हिंदी का यह सूर्य अस्त हो गया। दमा (Asthma) की बीमारी के कारण उनका हृदय गति रुकने से निधन हुआ। लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है।

शोध संस्थान:
उनकी स्मृति और कार्यों को संरक्षित करने के लिए 1972 में वाराणसी में “आचार्य रामचन्द्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान” की स्थापना की गई।

  • स्थापना: यह उनके पुत्र गोकुल चंद्र शुक्ल की इच्छा और प्रयासों से संभव हुआ।
  • स्थान: वाराणसी स्थानीय प्राधिकरण द्वारा प्रदान की गई भूमि पर यह संस्थान बना। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके भवन निर्माण और विस्तार के लिए आर्थिक सहायता दी।
  • गतिविधियां: यह संस्थान हिंदी शोध का एक प्रमुख केंद्र है।

नया मानदंड (पत्रिका):
संस्थान की ओर से ‘नया मानदंड’ नामक शोध पत्रिका प्रकाशित की जाती है। इसकी प्रथम सचिव कुसुम चतुर्वेदी थीं, जिन्होंने इसे एक प्रतिष्ठित पत्रिका बनाया। इसमें महिला विमर्श, दलित साहित्य और उत्तर-आधुनिकतावाद जैसे विषयों पर विशेषांक निकाले गए। वर्तमान में इस संस्थान का कार्यभार डॉ. मंजीत चतुर्वेदी और सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ. मुक्ता संभाल रही हैं। कुसुम चतुर्वेदी और डॉ. मुक्ता ने आचार्य शुक्ल पर दूरदर्शन के लिए एक वृत्तचित्र (Documentary) का भी निर्माण किया है, जिससे नई पीढ़ी को शुक्ल जी के बारे में जानने का मौका मिला।

संस्थान के प्रमुख प्रकाशन:

  1. निराला और नजरूल का राष्ट्रीय चिंतन
  2. साड़ी के अंत में हिंदी
  3. निर्वाचित प्रबंध संकलन

भाग 11: निष्कर्ष और आज के दौर में प्रासंगिकता

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल केवल अतीत के लेखक नहीं हैं; वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। जब भी हम ‘कविता क्या है’ पर विचार करते हैं, या ‘भक्ति काल’ को समझना चाहते हैं, हमें शुक्ल जी के पास लौटना पड़ता है।

हजारी प्रसाद द्विवेदी, राम विलास शर्मा और नामवर सिंह जैसे दिग्गज आलोचकों ने शुक्ल जी की मान्यताओं से सहमति या असहमति जताई हो, लेकिन कोई भी उनकी उपेक्षा नहीं कर सका। नामवर सिंह ने ठीक ही कहा था— “शुक्ल जी भारतीय साहित्य के ऐसे वटवृक्ष हैं जिसकी छाया में हम सब पल रहे हैं।”

सारांश में शुक्ल जी का योगदान:

  1. हिंदी साहित्य को इतिहास लेखन की वैज्ञानिक दृष्टि दी।
  2. आलोचना को व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से निकालकर तर्कों पर आधारित किया।
  3. गद्य (निबंध) की एक नई, प्रौढ़ और विचारप्रधान शैली विकसित की।
  4. हिंदी को ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की भाषा बनाने का प्रयास किया।

2026 में भी, जब हम हिंदी साहित्य की बात करते हैं, तो चर्चा की शुरुआत और अंत आचार्य शुक्ल पर ही होती है। वे हिंदी के ‘पाणिनि’ तो नहीं, लेकिन हिंदी आलोचना के ‘व्यास’ अवश्य हैं।

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