मैं इस जीवन में क्यों आया हूँ? मैं इस पृथ्वी तल पर क्यों हूँ? मेरे जीवन की डोर कहां बंधी है? मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है? इनको तो केवल गुरुदेव आप ही समझा सकते हैं, अन्य किसी में यह क्षमता ही नहीं है, अन्य सभी का साथ तो केवल स्वार्थ का बन्धन है। इन पाशों से बंधा हुआ मैं छटपटा रहा हूँ, भय ग्रस्त हो रहा हूँ।
मैं प्रत्येक पल मृत्यु की ओर अग्रसर हो रहा हूँ, मेरे जीवन में सुख-सौभाग्य का सर्वथा अभाव है, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, कि आखिर मेरे जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य क्या है? मुझे समझाने में समर्थ कोई शक्ति है तो वह केवल एकमात्र आप हैं। इसीलिए हे गुरुदेव ! मैं अत्यन्त विगलित कण्ठ से, अत्यन्त भाव-विह्वलता के साथ आपको दण्डवत् प्रणाम करता हुआ, आपके श्री चरणों में अपने सिर को रखता हुआ प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे उस मर्म, उस रहस्य को समझाएं, जो मेरे जीवन का लक्ष्य है, जिसमें मेरे जीवन की पूर्णता है, क्योंकि मैं आप की शरण में हूँ और निश्चित रूप से केवल और केवल एकमात्र आप की ही शरण में हूँ।
लोग कह रहे हैं कि मैं देवताओं की आराधना करूं। कौन से देवता की आराधना करूं? हजारों-लाखों देवता हैं, किसकी प्रार्थना करूं? किस की चौखट पर जाकर भीख मांगू ? और वे मुझे दे भी क्या सकेंगे ? उनके पास है भी क्या देने के लिए? वे तो स्वयं आपके सामने हाथ बांधे खड़े हैं, जब ये स्वयं आप से बहुत कुछ पाने की आकांक्षा लिए खड़े हैं, तो मैं उन भिखारियों के पास क्यों जाऊं ? मैं सीधा आपके पास आकर, आपके चरणों में बैठना चाहता हूँ, जिससे मैं उन स्थितियों को प्राप्त कर सकूं, जो आप से प्राप्त हो सकती हैं। जब आप देवताओं को देने में समर्थ हैं, तो फिर आप मुझे भी देने में समर्थ हैं।
मैं देवताओं से परिचित नहीं हूँ, मैंने उन्हें देखा नहीं है, चित्रों के माध्यम से मात्र उनके अंकन को देखा है। हो सकता है कि वे चित्र सही हों, हो सकता है कि वे चित्र गलत हो। यह तो चित्रकार की एक भावना है जो कि कागज पर उसने उतारी है। उसने भी उस देवता को देखा नहीं है सिर्फ अपनी कल्पना को साकार रूप दिया है, अतः कागज पर अंकित चित्र अपने-आप में अधूरे है। मैं देवताओं से परिचित नहीं हूँ और न देवता मुझ से परिचित हैं, किन्तु गुरुदेव ! मैं आप से परिचित हूँ, मैंने आपके सारे शरीर को स्पर्श किया है, मैं आपके चरणों के समीप बैठा हूँ, आपके अंग-प्रत्यंग को मैंने अपनी आंखों के माध्यम से अपने हृदय में उतारा है, इसलिए मैं आप से अत्यधिक परिचित हूँ, आप तो श्रेष्ठ हैं, चेतना पुंज हैं, सब कुछ देने में समर्थ हैं, फिर मुझ जैसे अकिंचन व्यक्ति को कुछ भी देना आपके लिए असम्भव है ही नहीं, आपके लिए तो यह सामान्य सी बात है।
मैं तो आप में ही समस्त देवताओं का दर्शन कर रहा हूँ प्रत्येक रोम-रोम में एक नवीन देवता का दर्शन कर रहा हूँ और ये समस्त देवताओं का आगार, समूह आप में देखकर मैं भाव विह्वल हो जाता हूँ। अतः आप मुझे देवताओं की आराधना करने के लिए मत कहिए । जब मेरे सम्मुख आपके रूप में जीवित जाग्रत देवता हैं, तो फिर उन पाषाण मूर्तियों की पूजा क्यों करूं? मैं तो गुरुदेव केवल मात्र आपकी शरण में हूँ और एकमात्र आपकी ही शरण में हूँ।
मैं काशी और कांची हरिद्वार और मथुरा आदि तीर्थ स्थलों पर जाकर भी क्या कर लूंगा? गंगा में बार-बार डुबकी लगाने से भी क्या होगा ? यदि डुबकी लगाने मात्र से ही पवित्रता मिलती तो सारी मछलियां, मेंढक और घोंघे पवित्र और दिव्य हैं। यदि काशी में रहने से ही मोक्ष मिल जाता तो वहां श्वान-खर बहुत घूमते हैं, वे भी पूर्णत्व प्राप्त कर लेते। वहां जाने से कुछ प्राप्त होना सम्भव नहीं है। देवालयों में तो पत्थर की मूर्तियां हैं जो बोल नहीं पातीं, जो मेरी बात सुन नहीं पाते, मैं अपनी बात उन तक नहीं पहुंचा पाता, क्योंकि पत्थरों से कहने पर कुछ लाभ नहीं मिलता।
मेरे लिए ये सारे तीर्थ नगण्य हैं, क्योंकि मैं आपकी देह को ही पूर्णरूप से देवालय मानता हूँ, यही मेरा मंदिर है। आप के दोनों पैर इस देवालय के स्तम्भ हैं, इन स्तम्भों पर मंदिर टिका हुआ है, इस मंदिर में आपके प्राण रूपी, आपकी चेतना रूपी आपका हृदय स्थल मंदिर का गर्भगृह है, उस गर्भगृह में जब मैं प्रवेश करता हूँ तो मेरा रोम-रोम चैतन्य होकर गुरुदेव शब्द पुकारने लगता है। मैं भाव विह्वल हो जाता हूँ, मेरी आंखों से अश्रु प्रवाहित होने लगते हैं, जब मैं उस गर्भगृह में स्थित मूर्ति के दर्शन करता हूँ.. यह मूर्ति इतनी सजीव और तेजस्विता युक्त है कि इसके दर्शन मात्र से ही मेरे अन्दर आध्यात्मिक शक्ति का स्फुरण होने लगता है। ऐसा लगता है कि मेरा शरीर प्रसन्नता के आवेग में नृत्यमय हो गया है, इस गर्भगृह के ऊपर जहां मूल प्रतिमा स्थापित है, जहां आपका हृदय है, इसके ऊपर शिखर के रूप में आपका सिर है, जिसे देख हिमालय की ऊंचाई का भान होता है।
आपका दर्प युक्त सिर, आपका दैदीप्यमान सिर, आपका गर्वोन्नत भाल, नेत्र, कर्ण, नासिका, मुख, जिह्वा और आपका चेहरा उस तीर्थ के समान है, जिसके दर्शन मात्र से पवित्रता का अवगाहन होता है, ऐसा लगता है कि सातों समुद्र और गंगा आदि समस्त पवित्र नदियां स्वयं आकर मुझे स्नान करा रही हैं। आपके नेत्रों से निकलने वाली कृपा-वृष्टि का आनन्द वही समझ सकता है जो आपके पास खड़ा होकर इस वर्षा में भीगा है। ऐसे व्यक्ति के समान धन्य कोई हो ही नहीं सकता, इस पवित्र मंदिर को छोड़कर मैं कहां जाऊं? यदि मैं इस मंदिर में प्रवेश नहीं कर सका, इस मंदिर की सेवा नहीं कर सकता तो मेरा सारा जीवन व्यर्थ है, क्योंकि इस मंदिर का दर्शन करने के लिए देवता भी तरसते हैं, अपने-आप को न्यौछावर करने के लिए तत्पर हैं।
गुरुदेव ! आप किसी तीर्थ के पास जाने की आज्ञा मुझे मत दीजिए, ये सारे तीर्थ, पानी का बहाव हैं, मछलियों का सागर हैं, खारा समुद्र हैं, केवल मात्र झील हैं। मुझे ऐसे निर्जीव तीर्थों में जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यदि मैं समस्त तीर्थों का स्नान आपके नैत्रों से निकलती कृपा-वृष्टि से कर सकता हूँ तो फिर इस से बड़ा सौभाग्यशाली क्षण अन्य हो ही नहीं सकता, वास्तव में मैंने पुण्य किया होगा कि मैं आप के सामने खड़ा हूँ। वास्तव में मेरा पुण्योदय हुआ है, जिसके कारण आप मेरे सामने हैं और मैं इस युग में, इस पीढ़ी में आपके सामने उपस्थित हूँ। ऐसा इसलिए है, क्योंकि गुरुदेव मैं आप की शरण में हूँ, केवल और केवल मात्र आप की ही शरण में हूँ।
वह तो मूर्ख और मूढ़ व्यक्ति होगा जो आपके चरण छोड़कर इधर-उधर भटकता होगा, उसके पाप ही आड़े आते हैं जो आपकी दृष्टि से ओझल होता होगा, उसके जीवन का दुर्भाग्य होगा कि वह आप से दूर खड़ा होकर भी सांस ले रहा होगा, आप से दूर रह कर जीवित रहने की कल्पना ही आश्चर्यजनक है। जिस प्रकार मछली पानी से बाहर आते ही तड़प कर मर जाती है, उसी प्रकार आप से दूर होकर मैं मर क्यों नहीं जाता? जिन्दा रहने का तात्पर्य क्या है? जिस प्रकार से चकोर चांद को देखे बिना सिर फोड कर समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार हम समाप्त क्यों नहीं हो जाते ? आपका वियोग हम कैसे सहन कर पा रहे हैं? यह कैसे सम्भव है कि आप से दूर रह कर हमारे प्राण हमारे शरीर में टिक रह सकें ? ऐसे प्राणों की जरूरत भी नहीं है।
हे गुरुदेव ! मुझे ऐसे प्राण, ऐसा शरीर नहीं चाहिए। आप हैं तो जीवन है, आप हैं तो संसार है, खुशियां हैं, श्रेष्ठता है, दिव्यता है, यदि आप नहीं रहें और मैं जीवित रहूँ तो यह मेरे जीवन का दुर्भाग्य है, यह मेरे जीवन की न्यूनता और अभाव है। वास्तव में मैंने कोई पाप किया होगा जो आप के वियोग को सहन करते हुए भी जीवित हूँ, आप के बिना मैं सांस ले रहा हूँ, खाना खा रहा हूँ, पानी पी रहा हूँ और चल रहा हूँ, ये सब मेरे जीवन की न्यूनताएं हैं। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आप से दूर होते ही मृत्यु मुझे समाप्त क्यों नहीं कर देती, क्योंकि मृत्यु के बाद तो कम से कम आपके पास रह सकूंगा, मरने के बाद आपके चरणों से लिपट तो सकूंगा, क्योंकि जहां मेरी मृत्यु हो, वहां से उड़ कर राख आपके चरणों के पास आकर गिरेगी ही और जब आप के चरणों के पास आकर गिरेगी, और जब आपके चरण उस पर पड़ेंगे तो उससे बड़ा मेरे जीवन का सौभाग्य और हो भी क्या सकता है।
मैं तो आप का प्रतिपल दर्शन करना चाहता हूँ, आपके पास रहना चाहता हूँ, मैं हर क्षण चकोर की तरह आप को देखते रहना चाहता हूँ, मैं तो हर क्षण पपीहे की तरह गुरु-गुरु शब्द का उच्चारण करना चाहता हूँ। हर क्षण मेरी हृदय की प्रत्येक धड़कन के साथ गुरु शब्द का उच्चारण हो। मेरा प्रत्येक चिन्तन गुरुमय हो। मेरा रोम-रोम आवाज दे सके – गुरु-गुरु….। मुझे गायत्री-काली या किसी अन्य मंत्र की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मंत्रों में सर्वश्रेष्ठ गुरु मंत्र मेरे पास है।
जब “ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः” मंत्र जैसा महामंत्र मेरे पास है तो अन्य मंत्रों की मुझे क्या आवश्यकता है? इसलिए मैं चाहता हूँ कि जीवन का प्रत्येक क्षण आपके साथ, आपके लिए व्यतीत हो, मेरा शरीर आपके काम आ सके, मैं आपके चरणों से लिपट सकूं, मैं आपकी देह की सुगन्ध से सुवासित हो सकूं और यदि आप से अलग होना ही पड़े तो मछली की तरह तड़प कर मर जाऊं, पत्थर पर सिर फोड़ कर मर जाऊं, मृत्यु प्राप्त हो जाए, मैं तो आप से ऐसा ही आशीर्वाद चाहता हूँ कि मैं एक क्षण भी आप की जुदाई सहन नहीं कर सकूं। मेरी आंखों से प्रवाहित आंसू की प्रत्येक बूंद पर आपका बिम्ब हो, मैं जीवन की ऐसी स्थिति चाहता हूँ, और यदि ऐसी स्थिति प्राप्त नहीं होती है तो मेरे जैसा पापी, अधर्मी कोई नहीं हो सकता, आप मुझे आशीर्वाद दें तो ऐसा ही आशीर्वाद दें कि मैं हर क्षण आप के पास रह सकूं, आपको अपनी आंखों से पी लेना चाहता हूँ, आप से एकाकार हो जाना चाहता हूँ, क्योंकि गुरुदेव मैं आपकी शरण में हूँ, केवल और केवल मात्र आपकी शरण में हूँ।
और लोगों ने अनुभव किया हो या न किया हो, किन्तु मैं तो आपके शरीर का एक हिस्सा हूँ। मैंने अनुभव किया है कि आप हिमालय से भी अधिक गर्व युक्त और सागर से भी ज्यादा विशाल हैं। आपका गर्वोन्नत भाल हिमालय से भी ज्यादा ऊंचा है, जब मैं आप की तरफ देखता हूँ तो मेरी आंखें चौंधिया जाती हैं, मैं नहीं समझ पाता है कि इस श्रेष्ठतम-गर्वोन्नत भाल को आंखों के माध्यम से कैसे हृदय में समाहित कर सकूंगा ? मैं जब आपके वक्षस्थल की ओर देखता हूँ तो सातों समुद्र हिलोरे मारते हुए दिखायी पड़ते हैं और मैं आपके वक्षस्थल में दुबक जाना चाहता हूँ, जहां मुझे सुख-सौभाग्य, तृप्ति व पूर्णता प्राप्त हो सकेगी।
जब मैं आप के सम्पूर्ण शरीर को देखता हूँ तो मेरे सामने समस्त ब्रह्माण्ड साकार हो उठता है। मुझे आपके शरीर में ही इन्द्र लोक, ब्रह्म लोक, रुद्र लोक दिखाई देता है, फिर मैं ब्रह्माण्ड साधना क्यों करूं, उससे होगा भी क्या ? आपके चेहरे पर आई मुस्कुराहट से ही सारे ब्रह्माण्ड में आहलाद व्याप्त हो जाता है, और इस पूरे ब्रह्माण्ड को जब मैं अपने सम्मुख देखता हूँ तो अपने-आप को बहुत छोटा और नगण्य लगने लगता हूँ, ऐसा लगता है कि इन लाखों-करोड़ों लोगों में जहां महानतम ऋषि हैं, समस्त देव योनियां हैं, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और अगस्त्य, पुलस्त्य, अत्रि, कणाद जैसे ऋषि हैं, इन सबके आगे तो मेरा अस्तित्व एक अत्यन्त सूक्ष्म कण के समान दिखाई देता है। इसके बावजूद भी आपने इस कण को अपनाया, इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है? इस कण पर आपने कृपा-दृष्टि की, अपने हाथों का स्पर्श प्रदान किया, यह मेरे जीवन का सौभाग्य है, अहोभाव है, मेरे पूर्व जन्मों के पुण्यों का उदय है।
मुझे गर्व है कि मैं ब्रह्माण्ड का एक हिस्सा बन सका। आपकी मेरी तुलना हो ही नहीं सकती, हजारों जन्म लेने के बाद भी आपके बराबर चिन्तन कर ही नहीं सकता। दीपक से सूर्य की बूंद से सागर की तुलना नहीं हो सकती, ठीक इसी प्रकार मेरी और आप की तुलना करना ही व्यर्थ है। यदि मैं इस ब्रह्माण्ड का एक कण बना हुआ रह सकूं तो यह मेरी बहुत बड़ी उपलब्धि है कि इस ब्रह्माण्ड में मेरा अस्तित्व है। इससे भी बड़ा सौभाग्य यह है कि इस कण पर आप की कृपा-दृष्टि है। इससे बड़ा सौभाग्य मुझे क्या चाहिए?
जब मैं पूर्ण भावना के साथ आपके चरणों में झुकता हैं तो मुझे वहां विश्वनाथ की नगरी दिखाई देती है, समस्त तीर्थों का दर्शन स्वतः हो जाता है, ये मात्र चरण ही नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण देवलोक हैं। जब श्री चरणों को आंसुओं से प्रक्षालित करता हूँ तो ऐसा लगता है कि समस्त देवताओं का पूजन एक साथ कर लिया हो। आपका यह दिव्यतम, अद्वितीय शरीर, गर्वोन्नत भाल तीक्ष्ण और सुन्दर आंखें और होठों पर खेलती मुस्कुराहट मुझे पागल कर देती है। मैं इन सब में खो जाता हूँ, हर क्षण इस मुस्कान में निमग्न रहता हूँ, हर क्षण यह इच्छा रहती है कि दौड़ कर आपके पास आऊं।
जब मैं वक्षस्थल की दृढ़ता को देखता हूँ तो स्पष्ट होता है कि आपके वक्षस्थल में इतनी तीव्रता, इतना भाव है कि यदि हिमालय से टकरा जाए तो कई कदम उसे पीछे हटना पड़ जाए। ऐसा अद्वितीय वक्षस्थल न किसी का रहा है, न किसी का हो सकता है, मैंने इस वक्षस्थल में सिमट कर, इसका स्पर्श व इसकी गर्मी का अहसास किया है, उस ऊष्णता को मैंने अपने हृदय में, अपने प्राणों में उतारा है। आपके लम्बे और अजानु बाहु, ताकत और प्रभुता के परिचायक हैं। ऐसा लगता है कि स्वयं इन्द्र मेरे सामने उपस्थित हो गया हो। वास्तव में ही आपके वरदहस्त आपकी श्रेष्ठता और आपकी अद्वितीयता को वर्णित नहीं किया जा सकता। सहस्रों मुख से भी यदि शेषनाग आपके गुणों को स्पष्ट करे तो उनके लिए सम्भव नहीं है।
मैं तो एक अकिंचन हूँ, शब्दों का भिखारी हूँ, मैं आप का वर्णन कर ही नहीं सकता, मैं तो आप को एकटक देखते हुए इन आंखों के माध्यम से हृदय में उतार लेना चाहता हूँ, मैं अपनी धड़कन में आपकी धड़कन को मिला देना चाहता हूँ, अपने-आपको आप के चरणों में निमग्न कर देना चाहता हूँ, अपने अस्तित्व को समाप्त कर देना चाहता हूँ, क्योंकि गुरुदेव मैं आप का हूँ, केवल मात्र आपका हूँ और आपकी शरण में हूँ। इस ब्रह्माण्ड में आपके अलावा और कोई मेरा रखवाला नहीं है, कोई मेरा अस्तित्व रखने वाला नहीं है, मैं तो केवल और केवल आप की ही शरण में हूँ।
इस समस्त ब्रह्माण्ड की शक्तियां वह चाहे महाकाली, महालक्ष्मी या महासरस्वती हो, चाहे वह बगला, तारा, धूमावती या जगदम्बा, किसी भी प्रकार की शक्ति हो, मैं तो यही देखता हूँ कि वे आपके सामने आप को प्रसन्न करने के लिए नृत्य कर रही हैं, आप की कृपा कटाक्ष पाने के लिए प्रयत्नशील हैं। जब मैं यह देखता हूँ तो सोचता हूँ कि आप को छोड़कर अन्य कौन-सी साधना मेरे लिए उपयुक्त है? क्या होगा इन शक्तियों की आराधना से ? क्या मिलेगा नवार्ण मंत्र के उच्चारण से ? इन सब को तो आपके सामने नृत्य करते देखता हूँ। यह सब देखकर मैं सोचता हूँ कि आप से बड़ा देवत्व क्या हो सकता है? आप अपने-आप में समग्र हैं, आप के दर्शन मात्र से ही मैं पूर्ण कुण्डलिनी जागरण व क्रिया योग से सम्पन्न हो जाता हूँ, पूर्णत्व प्राप्त कर लेता हूँ और सही अर्थों में देखा जाए तो वशिष्ठ, विश्वामित्र व अत्रि बन जाता हूँ, ब्रह्मा व रुद्र बन जाता हूँ।
आप के दर्शन मात्र से ही में इन देवताओं व ऋषियों के समान बन जाता हूँ। यह सम्भव है कि वे थोड़ा आगे हों और मैं थोड़ा पीछे रुका हुआ हूँ। हो सकता है कि उनके और मेरे बीच में फासला हो, लेकिन आप की कृपा-दृष्टि उन पर है तो उनसे भी पहले मुझ पर है, यह मेरे लिए प्रसन्नता, सौभाग्य व आनन्द की बात है। मुझे मंत्र, तंत्र, योग, दर्शन और मीमांसा नहीं चाहिए, क्योंकि आपके मुंह से निकला शब्द मंत्र है, तंत्र है, यदि उन शब्दों को अपने जीवन में उतार लेता हूँ तो ये सब मेरे सामने स्पष्ट हो जाएगा, आपके स्पर्श मात्र से सारी योग की भावभूमिया मेरे शरीर में अवतरित हो जाएगी। मैं तो आपके चरणों में निमग्न हो जाना चाहता हूँ। जब मैंने समुद्र को देखा है तो बंद को देख कर क्या करूंगा ? वसन्त के आगे एक हल्का सुगन्ध का झोंका मिला भी तो उससे क्या हो जाएगा? गुरुदेव मैं तो केवल यही मंत्र जानता हूँ कि मैं आपका हूँ, आप और आपकी कृपा-दृष्टि ही मेरी है। मैं तो यही साधना जानता हूँ कि मैं आपकी शरण में हूँ।
न मैं तो माता को जानता हूँ, न पिता को जानता हूँ, क्योंकि उनसे सिर्फ स्वार्थमय सम्बन्ध है। पिता इसलिए मुझे पुत्र कहते हैं कि मैं जीवन में उनके काम आ सकूं। मेरा न तो भाई है, न पत्नी है, न बन्धु है, न कोई बान्धव है और न ही वित्त है, न धन है और न ही कोई ऐश्वर्य है। मेरे जीवन में कुछ है ही नहीं, क्योंकि मैं जीवन में कुछ चाहता ही नहीं हूँ। यह सब तो क्षणभंगुर हैं, इनके द्वारा मुझे मेरे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। ये तो इस जीवन यात्रा के पड़ाव है, क्योंकि मैं जन्म से मृत्यु की ओर निरन्तर अग्रसर हो रहा हूँ, श्मशान की यात्रा में ये मेरे सहायक हैं, जो मुझे ठेल कर उधर अग्रसर कर रहे हैं। ये तो मात्र मेरी देह, मेरी सेवा व मेरे जीवन का अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करना चाहते हैं। इससे तो मैं एक देहधारी गंदा कीडा बन जाऊंगा। मैं पुत्र उत्पन्न करूंगा तो ज्यादा से ज्यादा वह मेरी अर्थी को कंधा दे देगा, पत्नी मेरी मृत्यु पर चार आंसू बहा देगी, किन्तु यह मेरे जीवन का प्रयोजन नहीं है, मैं उस स्थान पर खड़ा हूँ जहां सब तुच्छ हैं।
हिमालय के सामने एक बड़ा पत्थर कंकर के समान दिखता है, उसी प्रकार आपके सामने ये सारे सम्बन्ध बेमानी और अस्तित्व हीन लगने लगे हैं। मैं इन सम्बन्धों से जीवित नहीं रहना चाहता, इन बन्धनों में फंसना नहीं चाहता, ये मेरे जीवन का अभिशाप और पैरों की बेड़ियां हैं जो मुझे जकड़े हुए हैं। मैं एक अंधेरी कोठरी में फंस गया हूँ, मुझे द्वार नहीं मिल रहा है, दीवारों से टकरा कर मेरा सिर लहूलुहान हो गया है। इस समाज ने अंधकार व आलोचना के अलावा मुझे कुछ नहीं दिया है। मैं इस अंधकार से, इस दल-दल से निकलना चाहता हूँ। मैं गुरुमय बन करके अपने जीवन को पवित्र और दिव्य बनाना चाहता हूँ। मैं उस स्थिति को प्राप्त करना चाहता हूँ जिसको ऋषियों ने ‘अहं ब्रह्मास्मि’ कहा है। आप मुझ पर कृपा करें, वापस इन बंधनों में नहीं फंसने दें, मुझे किसी प्रकार का कोई मोह नहीं रहा है, यदि कोई मोह है तो आप उसे समाप्त करें। मैं मानसरोवर के पास आकर प्यासा नहीं रहना चाहता, आपके सामने आकर दुर्भाग्यमय नहीं बनना चाहता। मैं आपके चरणों में समर्पण चाहता हूँ, आपसे एकाकार हो जाना चाहता हूँ, आपके प्राणों की धड़कन बनना चाहता हूँ। हे गुरुदेव ! मैं आपकी शरण में हूँ और इस ब्रह्माण्ड में केवल मात्र आपकी ही शरण में हूँ।
मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार रहा हूँ, पूरी शक्ति प्राणों में भरकर उच्चारण कर रहा हूँ मैं अपनी बात आप तक पहुंचाना चाहता हूँ मेरा सारा शरीर कांप रहा है, आंखों से आंसू प्रवाहित हो रहे हैं, मुंह से वाणी नहीं निकल पा रही है, पूरे शरीर के रोम-रोम से आवाज आने लग गई है, मैं अपने आप में नहीं रहा हूँ। मैं एक ऐसी बूंद हूँ जो अंगारे पर पड़ते ही समाप्त हो जाती है, मैं एक बादल का टुकड़ा हूँ जो किसी पहाड़ से टकरा कर समाप्त हो जाना चाहता है, मैं तो एक ऐसा कण बनना चाहता हूँ जो आप का स्पर्श प्राप्त करना चाहता है। मैं आप में एकाकार और लीन होना चाहता हूँ और यदि ऐसा सम्भव नहीं है तो यह जीवन मेरे लिए मूल्यहीन है, व्यर्थ है, एक जीवित लाश है जिसे अपने कंधे पर उठाए हुए मृत्यु की ओर अग्रसर हो रहा हूँ।
क्या मेरी पुकार आप तक नहीं पहुंच रही है? क्या आप के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है? ऐसा हो ही नहीं सकता है, प्रभाव तो अवश्य पड़ रहा होगा, किन्तु मेरा ही कोई दुर्भाग्य है कि आप आगे बढ़कर मुझे अपना नहीं रहे हैं, मेरे अन्दर अवश्य कोई न्यूनता होगी, कि आपकी कृपा-दृष्टि मेरे ऊपर हो ही नहीं रही है, मेरे पाप ही आपके और मेरे बीच में पर्दा डाल रहे हैं, इन सब से आप ही मुझे बचाएं मेरे अन्दर इतनी क्षमता नहीं है कि इन्हें अपने से दूर ढकेल सकूं। मुझे कोई साधना या सिद्धि नहीं आती है, किसी मंत्र का ज्ञान नहीं है। मुझे तो केवल एक शब्द ‘गुरु’ ही बोलना आता है। मैंने तो केवल एक यही मंत्र सीखा है कि “गुरुदेव मैं आपकी शरण में हूँ और गुरुदेव मात्र आपकी ही शरण में हूँ।”
कई-कई जन्मों से आपका और मेरा साथ रहा है, कई-कई जन्मों से आपने मुझे खींच कर सही रास्ते पर खड़ा किया है, कई-कई जन्मों से आपने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। हर बार आपने मुझे समझाया है, हर बार मुझे चेतना दी है, मेरे प्राणों को झंकृत किया है, हर- बार आपने मुझे यह बताया है कि जीवन की पूर्णता क्या है? इसके बावजूद मैं अज्ञानी हूँ, बुद्धि से ग्रस्त हूँ, आपको मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, इसलिए समझ नहीं पा रहा हूँ कि आप हर क्षण परिवर्तनशील हैं, हर क्षण एक नए स्वरूप में मेरे सामने खड़े हो जाते हैं। मैं एक स्वरूप को समझने का प्रयास करता हूँ तो दूसरा, तीसरा, चौथा और न जाने कितने स्वरूप मेरे सामने आ जाते हैं, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि किस स्वरूप को समझें? ज्यों ही मैं समझने का प्रयत्न करता हूँ आप मेरे सामने माया का पर्दा डाल देते हैं और मैं फिर आपको सामान्य मानव समझने लगता हूँ और अपने जैसा मानव समझने लगता हूँ।
इस माया के आवरण में फंसकर उसी जगह जा कर खड़ा हो जाता हूँ, जहां से मैं चला था। प्रभु ! ऐसा मत करिए, यह बार-बार मेरी परीक्षा मत लें, बार-बार माया के आवरण में मुझे मत डालिए, बार-बार मुझे पीछे मत हटाइये, मुझमें किसी प्रकार का बल, साहस या क्षमता नहीं है, मैं तो अत्यन्त तुच्छ और नगण्य हूँ। मुझमें कोई ज्ञान की चेतना नहीं है, यदि आप की कृपा कटाक्ष मेरे ऊपर है तो आप मेरी भावनाओं को जाग्रत करें। यदि आप अपना समझते हैं तो मुझे अपने सीने से लगा लीजिए, मैं आप की धड़कन को अपने जीवन में उतार सकूं, अपने प्राणों को आप में लीन कर सकूं, आप से अलग मेरा अस्तित्व नहीं रहे, बूंद पूर्णतया समुद्र में विसर्जित हो जाए, मैं इसी प्रकार आप में समाहित हो जाना चाहता हूँ, क्योंकि मेरा एकमात्र सहारा, मेरा एकमात्र अवलम्ब गुरुदेव ! आप हैं, मैं आप की शरण में हूँ, केवल मात्र आप की शरण में हूँ।
पोस्ट का सारांश (Summary Points):
आत्म-ग्लानि और पुकार: शिष्य खुद को अज्ञानी, पापी और तुच्छ मानता है। वह गुरु से प्रार्थना कर रहा है कि वे उसे माया के पर्दे से बाहर निकालें और अपनी शरण में ले लें, क्योंकि गुरु के सिवा उसका कोई सहारा नहीं है।
जीवन के उद्देश्य की खोज: शिष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य और मृत्यु के भय से व्याकुल है। वह मानता है कि इस अस्तित्व के रहस्य को केवल गुरुदेव ही समझा सकते हैं।
गुरु ही जीवित तीर्थ हैं: शिष्य को पत्थर की मूर्तियों या बाहरी तीर्थ स्थलों (काशी, मथुरा, हरिद्वार) में कोई आस्था नहीं है। उसके लिए गुरु का शरीर ही पूर्ण देवालय (मंदिर) है और गुरु के चरण ही सबसे बड़ा तीर्थ हैं।
अन्य देवताओं का त्याग: शिष्य का कहना है कि जब स्वयं देवता गुरु से पाने की इच्छा रखते हैं, तो वह उन देवताओं के पास क्यों जाए? उसे गुरु के रोम-रोम में ही समस्त ब्रह्मांड और देवी-देवताओं के दर्शन होते हैं।
सांसारिक रिश्तों से वैराग्य: माता-पिता, पत्नी, पुत्र और धन-संपत्ति को शिष्य ने केवल “स्वार्थ के बंधन” और “शमशान की यात्रा के साथी” माना है। वह इन नश्वर रिश्तों से मुक्त होकर केवल गुरु से जुड़ना चाहता है।
पूर्ण समर्पण (Total Surrender): शिष्य की एकमात्र इच्छा है कि वह गुरु में उसी तरह विलीन हो जाए जैसे बूंद सागर में मिल जाती है। वह गुरु से अलग अपना अस्तित्व रखना ही नहीं चाहता।
मंत्र और ज्ञान की आवश्यकता नहीं: शिष्य स्वीकार करता है कि उसे मंत्र-तंत्र, योग या साधना का ज्ञान नहीं है। उसके लिए “ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः” और “गुरु” शब्द ही सबसे बड़ा महामंत्र है।
