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प्राचीन छत्तीसगढ़: इतिहास, आदिम मानव और सांस्कृतिक विरासत

छत्तीसगढ़ का संपूर्ण इतिहास एवं संस्कृति

यह दस्तावेज़ छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक काल से लेकर आधुनिक काल तक के इतिहास, यहाँ की कला-संस्कृति, साहित्य, प्रमुख व्यक्तित्व और महत्वपूर्ण घटनाओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है।


भाग 1: छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास

1. प्रागैतिहासिक काल

छत्तीसगढ़ में मानव निवास का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। इसके साक्ष्य रायगढ़ जिले के सिंघनपुर और कबड़ा पहाड़, राजनांदगांव के चितवाडोंगरी और बालोद के करहीभदर जैसे स्थानों से प्राप्त शैलचित्रों (Rock Paintings) के रूप में मिलते हैं। ये शैलचित्र उस काल के मानव जीवन, शिकार और सामाजिक गतिविधियों को दर्शाते हैं।

2. वैदिक, रामायण एवं महाभारत काल

  • वैदिक काल: वैदिक साहित्य में छत्तीसगढ़ का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन बाद के ग्रंथों में इसका संदर्भ मिलता है।

  • रामायण काल: रामायण काल में छत्तीसगढ़ को ‘दक्षिण कोसल’ और इसके बस्तर क्षेत्र को ‘दंडकारण्य’ के नाम से जाना जाता था। माना जाता है कि भगवान राम ने अपने वनवास का कुछ समय यहाँ बिताया था। शिवरीनारायण और तुरतुरिया जैसे स्थान रामायण की घटनाओं से जुड़े हैं।

  • महाभारत काल: महाभारत में भी कोसल राज्य का उल्लेख है। सहदेव द्वारा इस क्षेत्र पर विजय का वर्णन मिलता है। इस काल में ऋषभ तीर्थ और सिरपुर (तत्कालीन श्रीपुर) प्रमुख नगर थे।

3. नन्द, मौर्य, सातवाहन, वाकाटक एवं गुप्त काल

  • मौर्य काल (322-185 ई.पू.): अशोक के अभिलेखों से मौर्य साम्राज्य के प्रभाव का पता चलता है। सरगुजा की रामगढ़ पहाड़ियों में स्थित सीताबेंगरा और जोगीमारा गुफाओं को मौर्यकालीन माना जाता है।

  • सातवाहन काल (72 ई.पू. – 200 ई.): जांजगीर-चांपा के गुंजी और बिलासपुर के चकरबेड़ा से प्राप्त अभिलेख और सिक्के इस क्षेत्र में सातवाहन शासन की पुष्टि करते हैं।

  • वाकाटक काल (250-500 ई.): वाकाटकों का प्रभाव भी इस क्षेत्र पर रहा, जिसका उल्लेख अभिलेखों में मिलता है।

  • गुप्त काल (319-550 ई.): समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में ‘दक्षिण कोसल’ के राजा महेन्द्र और ‘महाकान्तार’ (बस्तर) के राजा व्याघ्रराज को पराजित करने का उल्लेख है। इस काल के सिक्के आरंग और बानबरद से प्राप्त हुए हैं।

4. गुप्तोत्तर काल (क्षेत्रीय राजवंश)

  • राजर्षितुल्य कुल: यह इस क्षेत्र का पहला ज्ञात क्षेत्रीय राजवंश था। आरंग से प्राप्त ताम्रपत्रों से इसके बारे में जानकारी मिलती है।

  • नलवंश (चौथी-बारहवीं शताब्दी): इनका शासन बस्तर क्षेत्र में था। इनकी राजधानी पुष्करी (भोपालपट्टनम्) थी। भवदत्त वर्मन और अर्थपति भट्टारक इस वंश के प्रमुख शासक थे।

  • शरभपुरीय वंश (5वीं-6वीं शताब्दी): इन्होंने सिरपुर (श्रीपुर) और शरभपुर को अपनी राजधानी बनाया। प्रसन्नमात्र और सुदेवराज इस वंश के शक्तिशाली शासक थे। इन्होंने सोने के सिक्के चलाए।

  • श्रीपुर का सोमवंश (पाण्डव वंश): 6वीं-8वीं शताब्दी : छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग

    • यह काल छत्तीसगढ़ के इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है।

    • महाशिव तीवरदेव इस वंश के संस्थापक थे।

    • महाशिवगुप्त बालार्जुन इस वंश के सबसे प्रतापी शासक थे, जिन्होंने लगभग 57 वर्षों तक शासन किया।

    • इनके शासनकाल में धार्मिक सहिष्णुता, कला और स्थापत्य का अभूतपूर्व विकास हुआ। सिरपुर का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर (ईंटों से निर्मित) इसी काल की देन है।

    • प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 639 ई. में सिरपुर की यात्रा की और यहाँ की समृद्धि का वर्णन किया।

  • मेकल का पाण्डव वंश एवं बाणवंश: ये सोमवंश के समकालीन छोटे राजवंश थे, जो अमरकंटक और पाली (कोरबा) के आसपास शासन करते थे।


भाग 2: छत्तीसगढ़ का मध्यकालीन इतिहास (कलचुरि राजवंश)

1. कलचुरि राजवंश (1000-1741 ई.)

यह छत्तीसगढ़ में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजवंश था।

  • रतनपुर के कलचुरि:

    • संस्थापक: कलिंगराज (राजधानी: तुम्माण)।

    • रत्नदेव प्रथम ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाया और महामाया मंदिर का निर्माण करवाया।

    • जाजल्लदेव प्रथम ने जांजगीर शहर बसाया और सोने के सिक्के चलाए।

    • कल्याण साय (1544-1581 ई.): यह एक महत्वपूर्ण शासक थे। इन्होंने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार की और 8 वर्षों तक दिल्ली दरबार में रहे। इन्होंने राजस्व व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए ‘जमाबंदी प्रणाली’ लागू की और गढ़ों को व्यवस्थित किया, जो अकबर की राजस्व व्यवस्था से प्रभावित थी।

  • रायपुर के कलचुरि (लहुरि शाखा):

    • 14वीं शताब्दी के अंत में रतनपुर शाखा से अलग होकर यह शाखा स्थापित हुई।

    • केशव देव इसके संस्थापक थे। इनकी राजधानी खल्लारी और बाद में रायपुर बनी।

2. मध्यकालीन अन्य राजवंश

  • कवर्धा का फणिनाग वंश (9वीं-14वीं शताब्दी): इन्होंने कवर्धा क्षेत्र पर शासन किया। इनका सबसे प्रसिद्ध निर्माण भोरमदेव मंदिर है, जिसे ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’ कहा जाता है।

  • कांकेर का सोमवंश (12वीं-14वीं शताब्दी): यह कांकेर क्षेत्र में शासन करने वाला एक छोटा राजवंश था।

3. कलचुरिकालीन शासन व्यवस्था

  • प्रशासनिक व्यवस्था: शासन की इकाई गढ़ों में विभाजित थी। एक गढ़ में 84 गाँव होते थे। प्रशासन सुव्यवस्थित था।

  • आर्थिक स्थिति: कृषि मुख्य आधार था। राजस्व व्यवस्था सुदृढ़ थी।

  • सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति: समाज परंपरागत था। शैव, वैष्णव और शाक्त धर्म प्रमुख थे। महामाया मंदिर जैसे शक्तिपीठों का निर्माण हुआ।

  • स्थापत्य एवं साहित्य: मंदिर निर्माण कला अपने चरम पर थी। पाली का शिव मंदिर, जांजगीर का विष्णु मंदिर और रतनपुर के मंदिर इसके उदाहरण हैं।


भाग 3: बस्तर का इतिहास

1. बस्तर के मध्यकालीन राजवंश

  • छिंदक नागवंश (1023-1324 ई.): इनका शासन बस्तर क्षेत्र में था। इनकी राजधानी बारसूर थी। इन्होंने बारसूर में कई मंदिर और तालाब बनवाए, जिनमें बत्तीसा मंदिर और मामा-भांजा मंदिर प्रसिद्ध हैं।

  • काकतीय राजवंश (1324-1947 ई.):

    • ये मूलतः वारंगल के चालुक्य वंश से संबंधित थे।

    • संस्थापक: अन्नमदेव। इन्होंने वारंगल से आकर यहाँ शासन स्थापित किया।

    • इन्होंने अपनी कुलदेवी ‘दंतेश्वरी’ को यहाँ स्थापित किया, जो आज भी बस्तर की आराध्य देवी हैं।

    • बस्तर का नामकरण: माना जाता है कि राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा रथयात्रा के बाद उन्हें ‘बस्तर’ की उपाधि मिली, जिससे इस क्षेत्र का नाम बस्तर पड़ा।

    • बस्तर का प्रसिद्ध दशहरा इन्हीं के शासनकाल में प्रारंभ हुआ।

    • राजधानियाँ: इनकी राजधानियाँ समय-समय पर बदलती रहीं, जैसे- मंदोता, बस्तर, और अंत में जगदलपुर।

    • प्रफुल्ल कुमारी देवी: ये छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला शासिका थीं, जिन्होंने 1922 से 1936 तक शासन किया।

2. बस्तर में मराठा एवं ब्रिटिश राज

  • 1778 ई. के बाद बस्तर में मराठों का हस्तक्षेप बढ़ा।

  • 1854 ई. के बाद यह क्षेत्र पूरी तरह से ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया और 1947 तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहा।


भाग 4: छत्तीसगढ़ का आधुनिक इतिहास (1741-1947 ई.)

1. छत्तीसगढ़ में मराठा आक्रमण एवं शासन (1741-1854 ई.)

  • मराठा आक्रमण (1741 ई.): नागपुर के भोंसला शासक रघुजी प्रथम के सेनापति भास्कर पंत ने रतनपुर पर आक्रमण किया और कलचुरि शासन का अंत किया।

  • प्रत्यक्ष मराठा शासन (बिम्बाजी भोंसला, 1758-87 ई.): बिम्बाजी ने रतनपुर को राजधानी बनाकर प्रत्यक्ष शासन किया और प्रशासनिक सुधार किए।

  • सूबेदारी शासन (1787-1818 ई.): व्यंकोजी भोंसला के समय छत्तीसगढ़ में सूबेदारों (जैसे- महीपत राव दिनकर, विट्ठल दिनकर) के माध्यम से शासन चलाया गया। यह काल शोषण और अव्यवस्था के लिए जाना जाता है।

2. मराठा शासन में ब्रिटिश नियंत्रण (1818-30 ई.)

नागपुर के शासक अप्पा साहब के अंग्रेजों से हारने और रघुजी तृतीय के अवयस्क होने के कारण, छत्तीसगढ़ का शासन ब्रिटिश अधीक्षकों के हाथ में आ गया। कैप्टन एग्न्यू प्रथम अधीक्षक थे।

3. पुनः भोंसला शासन (1830-54 ई.)

रघुजी तृतीय के वयस्क होने पर शासन पुनः भोंसलों को सौंप दिया गया, लेकिन ब्रिटिश रेजीडेंट का हस्तक्षेप बना रहा।

4. छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश शासन (1854-1947 ई.)

1854 में लॉर्ड डलहौजी की ‘हड़प नीति’ के तहत नागपुर राज्य का विलय ब्रिटिश साम्राज्य में कर लिया गया और छत्तीसगढ़ सीधे ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया।

5. 1857 की क्रांति एवं छत्तीसगढ़ में उसका प्रभाव

  • सोनाखान का विद्रोह: वीर नारायण सिंह ने अकाल पीड़ितों के लिए कसडोल के एक व्यापारी का गोदाम लूट लिया। उन्हें गिरफ्तार कर 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर फाँसी दे दी गई। वे छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद माने जाते हैं।

  • सम्बलपुर का विद्रोह: सुरेन्द्र साय ने लम्बे समय तक अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया।

  • रायपुर में सैन्य विद्रोह: हनुमान सिंह (मैगजीन लश्कर) ने सार्जेंट मेजर सिडवेल की हत्या कर विद्रोह का बिगुल फूंका। उन्हें ‘छत्तीसगढ़ का मंगल पांडे’ कहा जाता है।


भाग 5: छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय आन्दोलन

1. राष्ट्रीय जागरण एवं प्रारंभिक गतिविधियाँ

  • पं. सुन्दरलाल शर्मा: इन्हें ‘छत्तीसगढ़ का गांधी’ कहा जाता है। उन्होंने सामाजिक सुधार, विशेषकर अछूतोद्धार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया।

  • समाचार पत्रों की भूमिका: ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ (पं. माधवराव सप्रे द्वारा 1900 में प्रकाशित) जैसे समाचार पत्रों ने जनजागृति फैलाई।

  • होमरूल आन्दोलन (1916): पं. रविशंकर शुक्ल, छेदीलाल बैरिस्टर आदि के नेतृत्व में यह आंदोलन चलाया गया।

  • कंडेल नहर सत्याग्रह (1920): धमतरी के कंडेल ग्राम में नहर पानी पर लगाए गए जुर्माने के विरोध में यह सफल सत्याग्रह हुआ।

  • गांधीजी की प्रथम छत्तीसगढ़ यात्रा (20-21 दिसंबर, 1920): वे कंडेल सत्याग्रह के सिलसिले में रायपुर आए।

2. असहयोग आंदोलन (1920-22)

  • वकीलों ने वकालत छोड़ी (पं. रामदयाल तिवारी, प्यारेलाल सिंह)।

  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी का प्रचार हुआ।

  • सिहावा-नगरी में जंगल सत्याग्रह हुआ।

3. सविनय अवज्ञा आन्दोलन (1930-34)

  • रायपुर में पं. रविशंकर शुक्ल के नेतृत्व में नमक कानून तोड़ा गया। उन्हें ‘आंदोलन के पाँच पांडव’ का सहयोग मिला।

  • जंगल सत्याग्रह: इस दौरान गट्टासिल्ली, रुद्री नवागाँव, तमोरा और पोड़ी में जंगल सत्याग्रह हुए।

  • गांधीजी की द्वितीय छत्तीसगढ़ यात्रा (23-28 नवंबर, 1933): वे अछूतोद्धार कार्यक्रम के लिए दुर्ग, रायपुर और बिलासपुर आए।

4. भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

  • आंदोलन का छत्तीसगढ़ में व्यापक प्रभाव पड़ा।

  • रायपुर षड्यंत्र केस (रायपुर डायनामाइट कांड): परसराम सोनी और उनके साथियों ने जेल की दीवार उड़ाने की योजना बनाई, लेकिन वे पकड़े गए।

  • बिलासपुर में छात्रों ने जुलूस निकाला और दुर्ग में आगजनी की घटनाएँ हुईं।


भाग 6: रियासतों का भारत संघ में संविलियन

आजादी के बाद छत्तीसगढ़ की 14 रियासतों (जैसे- बस्तर, सरगुजा, रायगढ़, खैरागढ़) और अनेक जमींदारियों का भारत संघ में विलय हुआ। इसमें सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ-साथ ठाकुर प्यारेलाल सिंह जैसे स्थानीय नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका थी।


भाग 7: छत्तीसगढ़ में आदिवासी एवं अन्य विद्रोह

  • हलबा विद्रोह (1774-77): डोंगर क्षेत्र में अजमेर सिंह के नेतृत्व में हुआ।

  • परलकोट का विद्रोह (1825): गेंदसिंह के नेतृत्व में अबूझमाड़ियों ने मराठा और ब्रिटिश शोषण के विरुद्ध विद्रोह किया।

  • मेरिया विद्रोह (1842-63): हिड़मा मांझी के नेतृत्व में दंतेवाड़ा में प्रचलित नरबलि प्रथा (मेरिया) को समाप्त करने के ब्रिटिश प्रयास के विरुद्ध हुआ।

  • लिंगागिरि का विद्रोह (1856): धुरवा राम माड़िया के नेतृत्व में हुआ। इसे ‘बस्तर का महान मुक्ति संग्राम’ कहा जाता है।

  • कोई विद्रोह (1859): साल वृक्षों की कटाई के विरोध में नागुल दोरला के नेतृत्व में हुआ। नारा था- “एक साल वृक्ष के पीछे एक व्यक्ति का सिर”।

  • मुरिया विद्रोह (1876): झाड़ा सिरहा के नेतृत्व में दीवान के शोषण और ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध हुआ।

  • भूमकाल विद्रोह (1910): बस्तर का सबसे बड़ा और संगठित विद्रोह। इसका नेतृत्व गुण्डाधूर ने किया। इसका प्रतीक ‘आम की टहनी और लाल मिर्च’ था।

किसान एवं मजदूर आंदोलन

  • राजनांदगांव मजदूर आंदोलन (1920, 1924, 1937): ठाकुर प्यारेलाल सिंह के नेतृत्व में बीएनसी मिल के मजदूरों ने हड़ताल की।

  • दुर्ग-डांडी का किसान आंदोलन (1937-39): नरसिंह प्रसाद अग्रवाल के नेतृत्व में किसानों ने शोषण के विरुद्ध आंदोलन किया।


भाग 8: छत्तीसगढ़ की संस्कृति, कला एवं साहित्य

1. छत्तीसगढ़ी भाषा एवं साहित्य

  • छत्तीसगढ़ी भाषा: यह पूर्वी हिन्दी की एक बोली है, जिसे अब भाषा का दर्जा प्राप्त है।

  • छत्तीसगढ़ी साहित्यकार:

    • पं. सुंदरलाल शर्मा: नाटक, काव्य (छत्तीसगढ़ी दानलीला)।

    • पं. मुकुटधर पांडेय: छायावाद के प्रवर्तक।

    • प्यारेलाल गुप्त: ‘छत्तीसगढ़ के विद्यासागर’।

    • कपिलनाथ कश्यप: ‘खूब तमाशा’ के रचनाकार।

    • डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा: ‘अरपा पैरी के धार’ (छत्तीसगढ़ का राजगीत) के रचयिता।

    • अन्य: बंशीधर पांडेय, हरि ठाकुर, लाला जगदलपुरी, केयूर भूषण, दानेश्वर शर्मा।

2. लोक कलाएँ, संस्थाएँ और कलाकार

  • पंडवानी: महाभारत की कथा का छत्तीसगढ़ी लोक रूप।

    • शैली: वेदमती (बैठकर) और कापालिक (खड़े होकर)।

    • प्रमुख कलाकार: झाडूराम देवांगन (गुरु), पद्म विभूषण तीजन बाई, ऋतु वर्मा।

  • भरथरी: राजा भरथरी और रानी पिंगला की वियोग गाथा। सुरुज बाई खांडे प्रमुख गायिका थीं।

  • नाचा: गम्मत और प्रहसन पर आधारित लोकनाट्य। दुलार सिंह मंदराजी को ‘नाचा का भीष्मपितामह’ कहा जाता है।

  • रहस: राधा-कृष्ण की लीलाओं पर आधारित लोकनाट्य।

3. लोकनृत्य एवं जनजातीय नृत्य

  • सुआ नृत्य: दिवाली के समय महिलाओं द्वारा किया जाने वाला नृत्य, जिसमें वे तोते के माध्यम से अपना संदेश देती हैं।

  • पंथी नृत्य: सतनामी पंथ द्वारा गुरु घासीदास की जयंती पर किया जाने वाला पिरामिड बनाकर किया जाने वाला ऊर्जावान नृत्य। देवदास बंजारे इसके प्रसिद्ध कलाकार थे।

  • राउत नाच: दिवाली के बाद यादव समुदाय द्वारा किया जाने वाला शौर्य और भक्ति का नृत्य।

  • करमा, सैला, गौर, ककसार, सरहुल: ये विभिन्न जनजातियों द्वारा किए जाने वाले प्रमुख नृत्य हैं।

4. लोकगीत एवं लोकसंस्कृति

  • लोकगीत: ददरिया (प्रेम गीत), सोहर (जन्म गीत), बिहाव गीत (विवाह गीत), भोजली, पंडवानी।

  • लोक चित्रकला: घरों की दीवारों पर की जाने वाली चित्रकारी, जैसे- सवनाही, नोहडोरा।

  • आभूषण: पारंपरिक आभूषण जैसे- सुता, रुपिया माला, ऐंठी, पैरी।

  • कहावतें (हाना) एवं मुहावरे: छत्तीसगढ़ी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं।

5. पुरातत्व, कला एवं स्थापत्य

  • मंदिर वास्तु:

    • ईंटों के मंदिर (6वीं-9वीं शताब्दी): सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर, पुजारीपाली का केवटीन मंदिर।

    • पाषाण निर्मित मंदिर (कलचुरिकालीन): भोरमदेव मंदिर (कवर्धा), पाली का शिव मंदिर (कोरबा), जांजगीर का विष्णु मंदिर।

  • मूर्तिकला: सिरपुर, तालागांव, मल्हार और बारसूर मूर्तिकला के प्रमुख केंद्र रहे हैं। तालागांव की रुद्र-शिव प्रतिमा अद्वितीय है।

  • सिक्के एवं अभिलेख: आरंग, मल्हार, सिरपुर आदि स्थानों से विभिन्न कालों के सिक्के और अभिलेख प्राप्त हुए हैं।


भाग 9: छत्तीसगढ़ के महान् व्यक्तित्व

  • गुरु घासीदास: सतनाम पंथ के संस्थापक, जिन्होंने ‘मनखे-मनखे एक समान’ का संदेश दिया।

  • वीर नारायण सिंह: 1857 क्रांति के प्रथम शहीद।

  • पं. सुन्दरलाल शर्मा: छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय जागरण के अग्रदूत, समाज सुधारक।

  • पं. रविशंकर शुक्ल: मध्य प्रांत के प्रथम मुख्यमंत्री और आधुनिक छत्तीसगढ़ के निर्माताओं में से एक।

  • ठाकुर प्यारेलाल सिंह: मजदूर आंदोलन के प्रणेता और सहकारिता के जनक।

  • डॉ. खूबचन्द बघेल: पृथक् छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा और समाज सुधारक।

  • मिनीमाता: छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला सांसद, जिन्होंने समाज के वंचित वर्ग के लिए कार्य किया।

  • राजा चक्रधर सिंह: रायगढ़ के राजा, जो संगीत और कथक नृत्य के महान संरक्षक थे।

  • गुण्डाधूर: 1910 के भूमकाल विद्रोह के महानायक।


भाग 10: वस्तुनिष्ठ प्रश्न (अभ्यास हेतु)

  1. प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने किस राजवंश के शासनकाल में सिरपुर की यात्रा की थी?
    (अ) शरभपुरीय वंश
    (ब) नलवंश
    (स) सोमवंश (पाण्डव वंश)
    (द) कलचुरि वंश
    उत्तर: (स) सोमवंश (पाण्डव वंश)

  2. ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’ किस मंदिर को कहा जाता है?
    (अ) लक्ष्मण मंदिर, सिरपुर
    (ब) भोरमदेव मंदिर, कवर्धा
    (स) महामाया मंदिर, रतनपुर
    (द) दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा
    उत्तर: (ब) भोरमदेव मंदिर, कवर्धा

  3. 1857 की क्रांति के दौरान सोनाखान विद्रोह का नेतृत्व किसने किया था?
    (अ) हनुमान सिंह
    (ब) सुरेन्द्र साय
    (स) गुण्डाधूर
    (द) वीर नारायण सिंह
    उत्तर: (द) वीर नारायण सिंह

  4. छत्तीसगढ़ में ‘कंडेल नहर सत्याग्रह’ का संबंध किस वर्ष से है?
    (अ) 1918
    (ब) 1920
    (स) 1930
    (द) 1942
    उत्तर: (ब) 1920

  5. ‘कोई विद्रोह’ का मुख्य कारण क्या था?
    (अ) नरबलि प्रथा पर रोक
    (ब) अत्यधिक राजस्व
    (स) साल वृक्षों की कटाई
    (द) बाहरी लोगों का हस्तक्षेप
    उत्तर: (स) साल वृक्षों की कटाई

  6. पंडवानी गायिका तीजन बाई किस शैली के लिए प्रसिद्ध हैं?
    (अ) वेदमती
    (ब) कापालिक
    (स) दोनों
    (द) इनमें से कोई नहीं
    उत्तर: (ब) कापालिक

  7. छत्तीसगढ़ राज्य का राजगीत ‘अरपा पैरी के धार’ के रचयिता कौन हैं?
    (अ) पं. सुंदरलाल शर्मा
    (ब) डॉ. खूबचन्द बघेल
    (स) डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा
    (द) कपिलनाथ कश्यप
    उत्तर: (स) डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा

  8. छत्तीसगढ़ में मराठा शासन के दौरान ‘सूबेदारी प्रथा’ किसने प्रारंभ की थी?
    (अ) बिम्बाजी भोंसला
    (ब) भास्कर पंत
    (स) रघुजी तृतीय
    (द) व्यंकोजी भोंसला
    उत्तर: (द) व्यंकोजी भोंसला

  9. ‘भूमकाल विद्रोह’ (1910) के नायक कौन थे?
    (अ) गेंदसिंह
    (ब) झाड़ा सिरहा
    (स) गुण्डाधूर
    (द) धुरवा राम माड़िया
    उत्तर: (स) गुण्डाधूर

  10. छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला शासिका कौन थीं?
    (अ) रानी दुर्गावती
    (ब) मिनीमाता
    (स) प्रफुल्ल कुमारी देवी
    (द) रानी चोरिस
    उत्तर: (स) प्रफुल्ल कुमारी देवी

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