भूमिका (Introduction):
छत्तीसगढ़, जिसे ‘धान का कटोरा’ और ‘महतारी’ (माँ) के रूप में पूजा जाता है, अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ अपनी अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्व विख्यात है। यहाँ की मिट्टी में उत्सवों की महक है और यहाँ की हवाओं में प्राचीन इतिहास की गूँज। 1 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया यह राज्य आज अपनी परंपराओं को सहेजते हुए आधुनिकता की ओर कदम बढ़ा रहा है। छत्तीसगढ़ की असली आत्मा इसके गाँवों और विशेषकर बस्तर के अंचलों में बसती है, जहाँ आज भी ‘माटी’ को देवता मानकर पूजा जाता है।
इस विस्तृत लेख में हम छत्तीसगढ़ के उन पारंपरिक पर्वों, जनजातीय रीति-रिवाजों और ऐतिहासिक संदर्भों का विश्लेषण करेंगे जो इस राज्य को भारत का ‘सांस्कृतिक हृदय’ बनाते हैं।
भाग 1: बस्तर की अनूठी जनजातीय संस्कृति और पर्व
बस्तर को ‘साल वनों का द्वीप’ कहा जाता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी पहचान यहाँ की जनजातियाँ और उनके द्वारा मनाए जाने वाले प्रकृति-आधारित त्यौहार हैं।
1.1 माटी तिहार (Maati Tihar)
बस्तर के आदिवासियों के लिए मिट्टी केवल खेती का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। प्रतिवर्ष चैत्र मास में ‘माटी तिहार’ मनाया जाता है।
- अनुष्ठान: माटी देवगुड़ी (मंदिर परिसर) में कुएं जैसा एक छोटा गड्ढा खोदा जाता है। इसमें सियासी रस्सी से बंधी ‘बीजधाम’ मिट्टी अर्पित की जाती है।
- बीजपुटनी: ग्रामीण प्रसाद के रूप में ‘बीज धान’ प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि इस धान को खेतों में छिड़कने से फसल की पैदावार बढ़ती है।
1.2 चरू जातरा (Charu Jatra)
यह पूर्णतः कृषि भूमि को समर्पित पर्व है। इसकी एक विशिष्टता यह है कि इसमें महिलाएं सम्मिलित नहीं होतीं।
- बलि प्रथा: पुरुष वर्ग अपनी भूमि की उर्वरता के लिए मुर्गा, बकरा और कबूतर की बलि देते हैं और सामूहिक भोज का आनंद लेते हैं।
1.3 दियारी तिहार (Diyari Tihar)
यह त्यौहार पशु-धन के प्रति सम्मान व्यक्त करने का माध्यम है। इसमें उस विशिष्ट स्थान की पूजा की जाती है जहाँ चरवाहा (गौटिया/यादव) दोपहर में पशुओं को विश्राम करवाता है। यह पशु और मनुष्य के गहरे संबंध को दर्शाता है।
1.4 लक्ष्मी जगार (Lakshmi Jagar)
छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति में ‘धान की बाली’ को साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है।
- प्रतीकात्मक विवाह: धान की बालियों को खेत से लाकर ‘जगार घर’ में स्थापित किया जाता है। यहाँ लक्ष्मी की प्रतीक बाली और विष्णु के प्रतीक नारियल का बड़े धूमधाम से विवाह संपन्न कराया जाता है। यह पर्व फसल के आगमन की खुशी का प्रतीक है।
1.5 अमूंस तिहार (Amuns Tihar)
हरेली अमावस्या के दिन मनाया जाने वाला यह पर्व ‘पशु चिकित्सा’ और आयुर्वेद के प्रति आदिवासियों के प्रेम को दर्शाता है।
- महत्व: इस दिन पशुओं को विभिन्न औषधियाँ खिलाई जाती हैं। इसमें विशेष रूप से ‘रसना’ और ‘शतावरी’ जैसे पौधों का औषधीय उपयोग किया जाता है ताकि पशु रोगों से मुक्त रहें।
1.6 नवाखानी (Navakhani)
नया अन्न ग्रहण करने का उत्सव ‘नवाखानी’ कहलाता है। यह भादो माह में मनाया जाता है।
- परंपरा: नई फसल का अन्न चखने से पहले उसे ग्राम देवी-देवताओं और कुल देवियों को अर्पित किया जाता है। इसके बाद ही आदिवासी परिवार उस अनाज का उपयोग करते हैं।
1.7 गाँचा पर्व (Goncha Parv)
जगदलपुर का यह पर्व ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- इतिहास: इसकी शुरुआत काकतीय नरेश की जगन्नाथ पुरी तीर्थयात्रा से जुड़ी है।
- तुमकिया: रथ यात्रा के दौरान आदिवासी ‘तुमकिया’ (एक प्रकार का बांस का खिलौना जो पटाखे जैसी आवाज करता है) चलाते हैं। यह पर्व नौ दिनों तक चलता है।
1.8 गोबर बोहरानी (Gobar Boharani)
दक्षिण बस्तर के छिन्दगढ़ में चैत्र मास में यह 10 दिवसीय पर्व मनाया जाता है।
- अनुष्ठान: ग्रामीण एक गड्ढे में प्रतिदिन गोबर डालते हैं। अंतिम दिन, ग्रामीण एक-दूसरे पर गोबर छिड़कते हैं और हंसी-मजाक (जिसमें अपशब्दों का प्रतीकात्मक उपयोग भी शामिल है) करते हैं। अंत में, उस गोबर को खेतों में खाद के रूप में डाला जाता है।
1.9 छेरछेरा (Cherchera)
“छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेर हेरा…” की गूँज पूरे प्रदेश में सुनाई देती है। पूस माह की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व दान का पर्व है।
- नकटा-नकटी: नर्तकों के समूह घर-घर जाकर नाचते हैं और अनाज दान में मांगते हैं। इस अनाज से ‘वनभोज’ किया जाता है।
1.10 बाली बरब और सरहुल (Bali Barab & Sarhul)
- बाली बरब: हलबा और भतरा जनजातियों में लोकप्रिय, जो तीन माह तक चलता है और भीमादेव को समर्पित है।
- सरहुल: उरांव जनजाति का प्रमुख पर्व, जहाँ सूर्य देव और धरती माता का प्रतीकात्मक विवाह (मुर्गा और मुर्गी के माध्यम से) रचाया जाता है।
भाग 2: हिंदी पंचांग के अनुसार छत्तीसगढ़ का कैलेंडर
छत्तीसगढ़ सरकार ने स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कई पर्वों पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। आइए देखें वर्ष भर के प्रमुख उत्सव:
| माह | पर्व / त्यौहार | विशेष विवरण |
| चैत्र | रामनवमी, सरहुल, माटी त्यौहार | डभरा मेला, गोबर बोहरानी |
| बैसाख | अक्षय तृतीया (अक्ती) | बीज बोआई का शुभारंभ, पुतरा-पुतरी विवाह |
| ज्येष्ठ | गंगा दशहरा, भीमा जात्रा | वर्षा की कामना हेतु अनुष्ठान |
| आषाढ़ | रथ यात्रा, गाँचा पर्व | मेघदूत सांस्कृतिक आयोजन, बीज बोहनी |
| सावन | हरेली अमावस्या | छत्तीसगढ़ का प्रथम त्यौहार, कृषि उपकरणों की पूजा |
| भाद्रपद (भादो) | तीजा, पोला, नवाखाई | तीजा (महिलाओं का व्रत), पोला (बैलों की पूजा) |
| कुवांर | नवरात्रि, विजय दशमी | जवारा विसर्जन, दशहरा उत्सव |
| कार्तिक | दीपावली, गोवर्धन पूजा, दियारी | बस्तर में पशु पूजा, देवउठनी एकादशी |
| अघन | लक्ष्मी पूजा | प्रत्येक गुरुवार को घर-घर में पूजा |
| पौष | छेरछेरा | दान-पुण्य और फसल कटाई का उत्सव |
| माघ | बसंत पंचमी, रामनामी | विद्या की देवी की पूजा |
| फाल्गुन | महाशिवरात्रि, होली | फाग गीत और रंगोत्सव |
भाग 3: छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक संदर्भ और नामकरण
‘छत्तीसगढ़’ शब्द की उत्पत्ति और इसके नाम के पीछे का इतिहास अत्यंत गौरवशाली और शोध का विषय रहा है।
3.1 प्राचीन नाम: दक्षिण कोसल और महाकान्तर
प्राचीन ग्रंथों और शिलालेखों में वर्तमान छत्तीसगढ़ को ‘दक्षिण कोसल’ कहा गया है। यह रामायण काल से ही महत्वपूर्ण रहा है। बस्तर क्षेत्र को प्राचीन काल में ‘चक्रकोट’ और ‘दण्डकारण्य’ के नाम से जाना जाता था। समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति में भी इस क्षेत्र का उल्लेख ‘महाकान्तर’ के रूप में मिलता है।
3.2 ‘छत्तीसगढ़’ शब्द का प्रथम साहित्यिक प्रयोग
इतिहासकारों के अनुसार, छत्तीसगढ़ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1487 ईस्वी में खैरागढ़ राज्य के राजा लक्ष्मीनिधि के कवि दलराम राव ने किया था।
- उनकी प्रसिद्ध पंक्ति थी: “लक्ष्मी निधि राय सुनो चित्त दे, गढ़ छत्तीस में न गढ़या रही…”
3.3 राजनीतिक संदर्भ और ‘खूब तमाशा’
रतनपुर के प्रसिद्ध कवि गोपाल मिश्र ने राजा राजसिंह (1689–1712 ई) के शासनकाल में अपनी रचना ‘खूब तमाशा’ में पहली बार राजनीतिक रूप से इस क्षेत्र के लिए ‘छत्तीसगढ़’ शब्द का प्रयोग किया।
- उनकी पंक्तियाँ थीं: “बसय छत्तीसगढ़ कुरी सब दिन के रस वासी बस बस के…”
3.4 मराठा और ब्रिटिश काल में उल्लेख
- 1707 का सनद: मराठा काल के ऐतिहासिक दस्तावेजों में काशी नाथ गुप्ते की रचना ‘नागपुर कर भोंसल्याची बखर’ में इस नाम का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
- बाबू रेवाराम (1896): ‘विक्रम विलास’ और ‘तवारीख-ए-हैहयवंशी’ के रचयिता बाबू रेवाराम ने इस पावन भूमि को ‘छत्तीसगढ़’ की संज्ञा देते हुए इसकी महिमा का गान किया।
भाग 4: सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव
छत्तीसगढ़ के ये त्यौहार केवल मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं।
- प्रकृति प्रेम: यहाँ के अधिकांश त्यौहार जैसे हरेली, माटी तिहार और सरहुल सीधे तौर पर धरती, वनों और पशुओं से जुड़े हैं। यह विश्व को ‘पर्यावरण संरक्षण’ का संदेश देते हैं।
- सामुदायिक भावना: ‘बाली बरब’ और ‘गोबर बोहरानी’ जैसे पर्वों में पूरा गाँव एक साथ आता है, जिससे आपसी मतभेद दूर होते हैं और भाईचारा बढ़ता है।
- महिला सशक्तिकरण: ‘तीजा’ और ‘लक्ष्मी जगार’ जैसे पर्वों में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका छत्तीसगढ़ी समाज में स्त्री शक्ति के सम्मान को दर्शाती है।
✅ निष्कर्ष (Conclusion)
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक यात्रा यह सिद्ध करती है कि यह राज्य अपनी जड़ों से बहुत मजबूती से जुड़ा हुआ है। यहाँ के ‘छत्तीस गढ़ों’ की कहानियाँ और बस्तर के अंचलों की परंपराएं आज भी उतनी ही जीवंत हैं जितनी सदियों पहले थीं। श्री अरविन्द के स्वराज के विचारों की तरह, छत्तीसगढ़ का ‘धम्म’ और ‘कर्म’ उसकी माटी में ही समाहित है।
यदि आप छत्तीसगढ़ की यात्रा करते हैं, तो यहाँ के त्यौहारों में शामिल होकर आप केवल उत्सव का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि आप उस प्राचीन सभ्यता का हिस्सा बनते हैं जो ‘सर्वजन हिताय’ और ‘प्रकृति पूजन’ पर आधारित है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) – Google Ranking के लिए
1. छत्तीसगढ़ का प्रथम त्यौहार कौन सा माना जाता है?
छत्तीसगढ़ का प्रथम त्यौहार हरेली माना जाता है, जो सावन माह की अमावस्या को मनाया जाता है।
2. ‘छत्तीसगढ़’ शब्द का सबसे पहला उल्लेख किसने किया था?
छत्तीसगढ़ शब्द का सबसे पहला साहित्यिक उल्लेख 1487 में कवि दलराम राव ने अपनी कविता में किया था।
3. बस्तर का कौन सा पर्व 75 दिनों तक चलता है?
विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा 75 दिनों तक चलता है, जो माँ दंतेश्वरी को समर्पित है। (नोट: गाँचा पर्व भी जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ा एक प्रमुख पर्व है)।
4. ‘छेरछेरा’ त्यौहार किस माह में मनाया जाता है?
छेरछेरा का त्यौहार पौष माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह फसल कटने के बाद दान-पुण्य का उत्सव है।
5. छत्तीसगढ़ को प्राचीन काल में किस नाम से जाना जाता था?
प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग को ‘दक्षिण कोसल’ और बस्तर क्षेत्र को ‘दण्डकारण्य’ कहा जाता था।
Keywords: Chhattisgarhi Teej Tyohar, Bastar Tribal Festivals, Maati Tihar, Cherchera Festival, History of Chhattisgarh Name, Dakshin Kosal, Chhattisgarhi Culture Hindi, Goncha Parv Jagdalpur.
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