भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल विरोध प्रदर्शनों की एक श्रृंखला नहीं थी, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के साहस, बलिदान और वैचारिक क्रांति की महागाथा है। लगभग दो शताब्दियों के ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को उखाड़ फेंकने के लिए भारत के हर वर्ग—मजदूर, किसान, आदिवासी, क्रांतिकारी और बुद्धिजीवियों—ने अपनी आहुति दी।
इस लेख में हम 1885 में कांग्रेस की स्थापना से लेकर 1947 के विभाजन और रियासतों के एकीकरण तक के सफर का सविस्तार वर्णन करेंगे।
1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885)
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक संगठित स्वरूप देने के लिए 28 दिसंबर, 1885 को बॉम्बे (अब मुंबई) के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की गई।
स्थापना के प्रमुख कारक:
- नेतृत्व: इसकी स्थापना एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी ए.ओ. ह्यूम (A.O. Hume) के पहल पर हुई थी। इसमें दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता और सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे प्रबुद्ध भारतीय नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उद्देश्य: प्रारंभ में इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना नहीं, बल्कि ब्रिटिश राज के भीतर रहकर भारतीयों के लिए राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की मांग करना था।
- उदारवादी चरण (1885-1905): शुरुआत में कांग्रेस ‘प्रार्थना और याचिका’ की नीति पर चलती थी। इसे उदारवादी युग कहा जाता है, जहाँ नेता संवैधानिक सुधारों में विश्वास रखते थे।
2. बंगाल का विभाजन (1905) और उसका प्रभाव
ब्रिटिश भारत के इतिहास में 1905 का बंगाल विभाजन एक निर्णायक मोड़ था। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने प्रशासनिक सुविधा का तर्क देकर बंगाल को दो भागों (पूर्वी और पश्चिमी बंगाल) में बांट दिया।
विभाजन के पीछे की कूटनीति:
वास्तविक उद्देश्य ‘प्रशासनिक सुविधा’ नहीं, बल्कि बंगाल में पनप रहे राष्ट्रवाद को कुचलना और ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ना था।
परिणाम और विरोध:
इस विभाजन के विरोध में पूरे देश में आक्रोश फैल गया। इसे ‘बंग भंग’ आंदोलन कहा गया। इस आंदोलन ने उदारवादियों के स्थान पर ‘गरम दल’ (लाल-बाल-पाल) को मुख्यधारा में ला दिया। बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल और लाला लाजपत राय ने इसका कड़ा विरोध किया।
3. स्वदेशी आंदोलन: आत्मनिर्भरता की पहली गूँज
बंगाल विभाजन के प्रत्युत्तर में 1905 में स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला बड़ा जन-आंदोलन था।
आंदोलन के प्रमुख स्तंभ:
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार: मैनचेस्टर के कपड़ों और लिवरपूल के नमक का बहिष्कार किया गया। विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई।
- स्वदेशी को बढ़ावा: भारतीय उद्योगों, मिलों और हस्तशिल्प को प्रोत्साहित किया गया। इसी समय ‘टाटा आयरन एंड स्टील’ जैसे उद्योगों की नींव मजबूत हुई।
- राष्ट्रीय शिक्षा: ब्रिटिश शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार कर राष्ट्रीय स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना की गई।
प्रभाव: इस आंदोलन ने भारतीयों में स्वराज (Self-rule) की तड़प पैदा की और ब्रिटिश सरकार को 1911 में बंगाल विभाजन वापस लेने पर मजबूर कर दिया।
4. साम्प्रदायिकता का उदय एवं विकास
साम्प्रदायिकता का उदय भारतीय राष्ट्रवाद को कमजोर करने की एक ब्रिटिश साजिश थी।
- उदय के कारण: 19वीं सदी के अंत में ब्रिटिशों ने महसूस किया कि हिंदू-मुस्लिम एकता उनके साम्राज्य के लिए खतरा है। उन्होंने प्रतिनिधित्व और संसाधनों की प्रतिस्पर्धा को धार्मिक रंग देना शुरू किया।
- मुस्लिम लीग की स्थापना (1906): साम्प्रदायिक राजनीति को तब बल मिला जब 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। इसके बाद ‘पृथक निर्वाचक मंडल’ जैसी मांगों ने समुदायों के बीच दूरी बढ़ा दी।
- विकास: हिंदू महासभा और अन्य साम्प्रदायिक संगठनों के उदय ने इस खाई को और चौड़ा किया, जिसका अंतिम और दुखद परिणाम 1947 का विभाजन था।
5. क्रांतिकारी आंदोलन: सशस्त्र विद्रोह की राह
कांग्रेस की अहिंसक नीतियों से इतर, युवाओं का एक ऐसा वर्ग उभरा जो सशस्त्र क्रांति के माध्यम से आजादी चाहता था।
- उद्देश्य: ब्रिटिश अधिकारियों में भय पैदा करना और बलपूर्वक सत्ता हथियाना।
- प्रमुख संगठन और क्रांतिकारी:
- अनुशीलन समिति (बंगाल)
- गदर पार्टी (अमेरिका में लाला हरदयाल द्वारा)
- HSRA (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन): भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुखदेव जैसे वीरों ने बम और पिस्तौल की राजनीति के साथ-साथ समाजवाद का संदेश फैलाया।
- महत्व: इन आंदोलनों ने ब्रिटिश सरकार को यह एहसास कराया कि वे भारत पर लंबे समय तक बलपूर्वक शासन नहीं कर सकते।
6. होमरूल आंदोलन (1916)
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, जब ब्रिटिश सरकार संकट में थी, तब बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने 1916 में ‘होमरूल लीग’ की स्थापना की।
- प्रेरणा: यह आंदोलन आयरलैंड के होमरूल आंदोलन से प्रेरित था।
- लक्ष्य: ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर रहते हुए भारतीयों के लिए ‘स्वशासन’ प्राप्त करना।
- नारा: तिलक ने इसी समय अपना प्रसिद्ध नारा दिया—“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”
7. गांधीवादी युग: अहिंसा और सत्याग्रह (1915-1947)
1915 में दक्षिण अफ्रीका से महात्मा गांधी की वापसी ने भारतीय राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने ‘सत्याग्रह’ और ‘अहिंसा’ को अपना मुख्य हथियार बनाया।
प्रमुख आंदोलन:
- असहयोग आंदोलन (1920-22): जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद शुरू हुआ। लोगों ने सरकारी उपाधियां लौटाईं और न्यायालयों का बहिष्कार किया। चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने इसे वापस ले लिया।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34): इसकी शुरुआत प्रसिद्ध दांडी मार्च (नमक सत्याग्रह) से हुई। गांधीजी ने समुद्र किनारे नमक बनाकर ब्रिटिश कानून को चुनौती दी।
- खिलाफत आंदोलन: मुस्लिम समुदाय के साथ मिलकर हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने का प्रयास।
8. भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब क्रिप्स मिशन विफल हो गया, तब गांधीजी ने अपना अंतिम और सबसे बड़ा आह्वान किया—“भारत छोड़ो”।
- अगस्त क्रांति: 8 अगस्त 1942 को बॉम्बे के ग्वालिया टैंक मैदान से गांधीजी ने “करो या मरो” (Do or Die) का नारा दिया।
- दमन: सरकार ने सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन आंदोलन स्वतःस्फूर्त होकर पूरे देश में फैल गया। रेल पटरियां उखाड़ दी गईं और समानांतर सरकारें स्थापित की गईं।
9. मजदूर, किसान और आदिवासी आंदोलन
स्वतंत्रता संग्राम केवल शहरों तक सीमित नहीं था। ग्रामीण भारत में भी शोषण के खिलाफ विद्रोह की आग सुलग रही थी।
- किसान आंदोलन: अवध किसान सभा, चंपारण सत्याग्रह और बारदोली सत्याग्रह में किसानों ने लगान के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
- मजदूर आंदोलन: औद्योगीकरण के साथ-साथ मजदूरों ने बेहतर वेतन और काम के घंटों के लिए एटक (AITUC) जैसे संगठनों के बैनर तले संघर्ष किया।
- आदिवासी विद्रोह: तिलका मांझी, बिरसा मुंडा और सिद्धू-कान्हू के नेतृत्व में आदिवासियों ने अपनी जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए ब्रिटिश सेना के दांत खट्टे किए।
10. समाज सुधार और दलित आंदोलन
आजादी की लड़ाई के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी संघर्ष जारी था।
- दलित सुधार: डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने दलितों को ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ का नारा दिया। उन्होंने महाड़ सत्याग्रह और गोलमेज सम्मेलनों के माध्यम से दलितों के लिए राजनीतिक अधिकारों की वकालत की।
- ज्योतिबा फुले और गांधीजी: फुले ने ‘सत्यशोधक समाज’ के जरिए और गांधीजी ने ‘हरिजन सेवक संघ’ के जरिए छुआछूत के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया।
11. आजाद हिन्द फौज (INA) और सुभाष चंद्र बोस
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।” उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान के सहयोग से आजाद हिन्द फौज का पुनर्गठन किया। ‘दिल्ली चलो’ के नारे के साथ उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य को सैन्य चुनौती दी। भले ही सैन्य रूप से वे सफल नहीं हुए, लेकिन उन्होंने भारतीय सैनिकों के मन में ब्रिटिश वफादारी को खत्म कर दिया।
12. स्वतंत्रता, विभाजन और एकीकरण (1947)
लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन यह आजादी अपने साथ विभाजन की त्रासदी भी लाई।
- विभाजन: धार्मिक आधार पर भारत और पाकिस्तान दो राष्ट्र बने। इस दौरान हुए दंगों में लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई और विस्थापन का दर्द सहा।
- रियासतों का विलीनीकरण: आजादी के समय भारत में 500 से अधिक रियासतें थीं। लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की दूरदर्शिता और कूटनीति के कारण जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर सहित सभी रियासतों का भारत में सफल विलय हुआ।
निष्कर्ष
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एक लंबी और कठिन यात्रा थी। यह हमें सिखाता है कि जब एक राष्ट्र एकजुट होकर अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है, तो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को भी झुकना पड़ता है। आज हम जिस स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, वह अनगिनत शहीदों के लहू और गांधी-नेहरू-पटेल-अंबेडकर-बोस जैसे महापुरुषों के विजन का परिणाम है।
💡 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष कौन थे?
व्योमेश चंद्र बनर्जी (W.C. Bonnerjee)।
2. बंगाल विभाजन कब और किसने रद्द किया?
1911 में लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय द्वारा।
3. “करो या मरो” का नारा किस आंदोलन में दिया गया?
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में।
4. लौह पुरुष किसे कहा जाता है?
सरदार वल्लभभाई पटेल को, उनकी रियासतों के एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका के लिए।
5. स्वदेशी आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार और भारतीय उद्योगों व उत्पादों को बढ़ावा देना।
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