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हिंदी व्याकरण का महाकोश: स्वर, व्यंजन, वर्तनी, लिंग, वचन और काल का संपूर्ण विश्लेषण

प्रस्तावना

हिंदी भाषा विश्व की सबसे वैज्ञानिक और समृद्ध भाषाओं में से एक है। इसकी वैज्ञानिकता का मुख्य आधार इसका सुव्यवस्थित व्याकरण है। किसी भी भाषा को शुद्ध रूप में बोलने, पढ़ने और लिखने के लिए उसके व्याकरणिक नियमों का ज्ञान होना अनिवार्य है। हिंदी व्याकरण की नींव ‘वर्ण विचार’ (स्वर और व्यंजन) से शुरू होकर ‘शब्द विचार’ (लिंग, वचन) और ‘वाक्य विचार’ (काल) तक विस्तृत है।

इस वृहद् लेख में हम हिंदी व्याकरण के इन महत्वपूर्ण स्तंभों—स्वर, व्यंजन, वर्तनी, लिंग, वचन और काल—का इतना गहरा और विस्तृत विश्लेषण करेंगे कि यह किसी भी विद्यार्थी, प्रतियोगी परीक्षार्थी या भाषा प्रेमी के लिए एक “अल्टीमेट गाइड” साबित होगा। इस लेख का उद्देश्य ५००० से अधिक शब्दों के माध्यम से भाषा के सूक्ष्म से सूक्ष्म पहलुओं को उजागर करना है।


भाग 1: वर्ण विचार – स्वर और व्यंजन की वैज्ञानिक संरचना

हिंदी वर्णमाला को ‘देवनागरी’ लिपि में लिखा जाता है। वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं जिसके खंड न किए जा सकें। वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं।

1.1 स्वर (Vowels): स्वतंत्र ध्वनियाँ

स्वर वे वर्ण हैं जिनका उच्चारण बिना किसी अन्य वर्ण की सहायता के स्वतंत्र रूप से किया जाता है। जब हम स्वरों का उच्चारण करते हैं, तो मुख से निकलने वाली वायु बिना किसी रुकावट के बाहर आती है।

स्वरों का वर्गीकरण:

हिंदी में मुख्य रूप से 11 स्वर माने जाते हैं: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। (अं और अः को अयोगवाह कहा जाता है)।

  1. ह्रस्व स्वर (Short Vowels): जिनके उच्चारण में सबसे कम समय लगता है। इन्हें ‘मूल स्वर’ भी कहते हैं।
    • संख्या: 4 (अ, इ, उ, ऋ)
  2. दीर्घ स्वर (Long Vowels): जिनके उच्चारण में ह्रस्व स्वर से दुगुना समय लगता है।
    • संख्या: 7 (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ)
  3. प्लुत स्वर (Extra Long Vowels): जिनके उच्चारण में ह्रस्व स्वर से तिगुना समय लगता है। जैसे: ओ३म्।

स्वरों की मात्राएँ:

जब स्वरों का प्रयोग व्यंजनों के साथ किया जाता है, तो उनका स्वरूप बदल जाता है। इस बदले हुए स्वरूप को ‘मात्रा’ कहते हैं। ‘अ’ स्वर की कोई मात्रा नहीं होती, यह हर व्यंजन में अंतर्निहित होता है।

स्वरमात्राउदाहरण
काम
िदिन
खीर
गुलाब
सूरज
गृह
केला
बैल
मोर
कौआ

1.2 व्यंजन (Consonants): परतंत्र ध्वनियाँ

व्यंजन वे वर्ण हैं जिनका उच्चारण स्वरों की सहायता के बिना संभव नहीं है। व्यंजनों के उच्चारण में फेफड़ों से निकलने वाली वायु मुख के अलग-अलग हिस्सों (कंठ, तालु, मूर्धा, दंत, ओष्ठ) से टकराकर बाहर आती है।

व्यंजनों का विस्तृत वर्गीकरण:

हिंदी में मूल व्यंजनों की संख्या 33 है, लेकिन संयुक्त और विकसित व्यंजनों को मिलाकर इनकी संख्या बढ़ जाती है।

1. स्पर्श व्यंजन (Occlusive Consonants): ये 25 होते हैं और पाँच वर्गों में विभाजित हैं:

  • क-वर्ग (कंठ्य): क, ख, ग, घ, ङ
  • च-वर्ग (तालव्य): च, छ, ज, झ, ञ
  • ट-वर्ग (मूर्धन्य): ट, ठ, ड, ढ, ण
  • त-वर्ग (दंत्य): त, थ, द, ध, न
  • प-वर्ग (ओष्ठ्य): प, फ, ब, भ, म

2. अन्तःस्थ व्यंजन (Semivowels): य, र, ल, व (संख्या: 4)
3. ऊष्म व्यंजन (Sibilants): श, ष, स, ह (संख्या: 4)
4. संयुक्त व्यंजन (Compound Consonants): जो दो व्यंजनों के मेल से बनते हैं।

  • क्ष (क् + ष), त्र (त् + र), ज्ञ (ज् + ञ), श्र (श् + र)
    5. द्विगुण व्यंजन (Flapped): ड़, ढ़ (इनका प्रयोग शब्द के आरंभ में कभी नहीं होता)।

भाग 2: वर्तनी (Spelling) – लेखन की शुद्धता और मानक नियम

वर्तनी का अर्थ है शब्दों में वर्णों का सही क्रम। उच्चारण की अशुद्धि के कारण अक्सर वर्तनी में गलतियाँ होती हैं। हिंदी एक ध्वन्यात्मक भाषा है, जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा जाता है।

2.1 वर्तनी के मानक नियम

  1. पंचम वर्ण और अनुस्वार: आधुनिक हिंदी में पंचम वर्णों (ङ, ञ, ण, न, म) के स्थान पर अनुस्वार (ं) का प्रयोग बढ़ गया है। जैसे: ‘दिनांक’ के स्थान पर ‘दिनांक’, ‘सम्बन्ध’ के स्थान पर ‘संबंध’।
  2. चंद्रबिंदु (अनुनासिक): जब स्वर का उच्चारण नाक और मुँह दोनों से होता है, तब चंद्रबिंदु (ँ) लगता है। जैसे: चाँद, आँख, गाँव। यदि शिरोरेखा के ऊपर मात्रा हो, तो चंद्रबिंदु की जगह बिंदु लगाया जाता है (जैसे: ‘गोंद’ न कि ‘गौँद’)।
  3. ‘र’ के विभिन्न रूप:
    • सामान्य: राम, रथ।
    • रेफ (पदों के ऊपर): कर्म, धर्म।
    • पदेन (पदों के नीचे): क्रम, चक्र, राष्ट्र।
  4. ह्रस्व और दीर्घ इ/ई की सावधानी: क्रियाओं के अंत में अक्सर ‘य’ और ‘इ’ का भ्रम होता है। मानक नियम के अनुसार ‘गयी’ के स्थान पर ‘गई’ और ‘हुये’ के स्थान पर ‘हुए’ का प्रयोग उचित माना जाता है।

2.2 सामान्य वर्तनी दोष और सुधार की तालिका

अशुद्ध शब्दशुद्ध शब्दनियम/कारण
अगामीआगामीस्वर संबंधी
आशिर्वादआशीर्वाद‘र’ का सही स्थान
कवियत्रीकवयित्रीअत्यंत सामान्य त्रुटि
उज्वलउज्ज्वलदो आधे ‘ज’ का प्रयोग
परिक्षापरीक्षादीर्घ स्वर की अशुद्धि
श्रृंगारशृंगारऋ और र का भ्रम

भाग 3: लिंग (Gender) – शब्दों का जातीय वर्गीकरण

संज्ञा के जिस रूप से यह पता चले कि वह पुरुष जाति का है या स्त्री जाति का, उसे लिंग कहते हैं। हिंदी में केवल दो लिंग होते हैं: पुल्लिंग और स्त्रीलिंग। (नपुंसकलिंग के शब्द भी पुल्लिंग या स्त्रीलिंग में ही रखे जाते हैं)।

3.1 लिंग की पहचान के विस्तृत नियम

हिंदी में लिंग की पहचान करना कठिन कार्य माना जाता है, लेकिन कुछ विशेष प्रत्ययों और संज्ञाओं के आधार पर इसे समझा जा सकता है।

पुल्लिंग की पहचान:

  1. देशों और पर्वतों के नाम: भारत, चीन, हिमालय, विंध्याचल (अपवाद: श्रीलंका)।
  2. दिनों और महीनों के नाम: सोमवार, चैत्र, वैशाख, अगस्त (अपवाद: जनवरी, मई, जुलाई)।
  3. धातुओं और रत्नों के नाम: सोना, ताँबा, हीरा, पन्ना (अपवाद: चाँदी)।
  4. वृक्षों के नाम: आम, नीम, पीपल (अपवाद: इमली)।
  5. जिनके अंत में ‘आ’, ‘पन’, ‘पा’ आए: लड़का, बचपन, बुढ़ापा।

स्त्रीलिंग की पहचान:

  1. नदियों के नाम: गंगा, यमुना, सरस्वती (अपवाद: ब्रह्मपुत्र, सोन)।
  2. भाषाओं और बोलियों के नाम: हिंदी, अंग्रेजी, अवधी, ब्रज।
  3. तिथियों के नाम: प्रथमा, एकादशी, अमावस्या।
  4. जिनके अंत में ‘ई’, ‘आनी’, ‘इन’, ‘िया’ आए: लड़की, सेठानी, मालिन, डिबिया।

3.2 लिंग परिवर्तन के नियम

  • अ/आ को ‘ई’ करके: लड़का -> लड़की, देव -> देवी।
  • आ को ‘िया’ करके: कुत्ता -> कुतिया, बूढ़ा -> बुढ़िया।
  • ‘इन’ प्रत्यय जोड़कर: धोबी -> धोबिन, साँप -> सँपिन।
  • ‘नी’ प्रत्यय जोड़कर: शेर -> शेरनी, ऊँट -> ऊँटनी।
  • ‘आनी’ प्रत्यय जोड़कर: जेठ -> जेठानी, इंद्र -> इंद्राणी।

भाग 4: वचन (Number) – संख्या का बोध

संज्ञा के जिस रूप से उसके एक या अनेक होने का पता चले, उसे वचन कहते हैं। हिंदी में दो वचन होते हैं: एकवचन और बहुवचन

4.1 वचन परिवर्तन के प्रमुख नियम

  1. अकारांत पुल्लिंग शब्दों में ‘आ’ को ‘ए’ करना:
    • लड़का -> लड़के, कमरा -> कमरे, जूता -> जूते।
  2. अकारांत स्त्रीलिंग शब्दों में ‘अ’ को ‘ऐं’ करना:
    • आँख -> आँखें, बहन -> बहनें, रात -> रातें।
  3. आकारांत स्त्रीलिंग शब्दों में ‘आ’ के बाद ‘एँ’ जोड़ना:
    • माला -> मालाएँ, कथा -> कथाएँ, माता -> माताएँ।
  4. इकारांत/ईकारांत स्त्रीलिंग शब्दों में ‘इयाँ’ जोड़ना:
    • जाति -> जातियाँ, नदी -> नदियाँ (दीर्घ ‘ई’ ह्रस्व ‘इ’ में बदल जाती है)।
  5. ‘उ’, ‘ऊ’, ‘औ’ शब्दों में ‘एँ’ जोड़ना:
    • वस्तु -> वस्तुएँ, बहू -> बहुएँ।

4.2 सदैव एकवचन और सदैव बहुवचन रहने वाले शब्द

यह प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण खंड है:

  • सदैव बहुवचन: प्राण, दर्शन, आँसू, हस्ताक्षर, होश, भाग्य, बाल।
    • उदाहरण: “उनके प्राण निकल गए।” (न कि ‘गया’)।
  • सदैव एकवचन: जनता, सोना, पानी, घी, वर्षा, आकाश, सत्य।
    • उदाहरण: “जनता विरोध कर रही है।”

भाग 5: काल (Tense) – क्रिया का समय चक्र

क्रिया के जिस रूप से कार्य के होने के समय का बोध हो, उसे काल कहते हैं। काल के तीन मुख्य भेद हैं: वर्तमान काल, भूतकाल और भविष्य काल।

5.1 वर्तमान काल (Present Tense)

जो समय अभी चल रहा है। इसके 5 उपभेद हैं:

  1. सामान्य वर्तमान: क्रिया का वर्तमान में होना। (मैं खाता हूँ)।
  2. अपूर्ण वर्तमान (तत्कालिक): क्रिया अभी चल रही है। (मैं खा रहा हूँ)।
  3. पूर्ण वर्तमान: कार्य अभी-अभी पूरा हुआ है। (वह आया है)।
  4. संदिग्ध वर्तमान: क्रिया के होने में संदेह हो। (वह पढ़ता होगा)।
  5. संभाव्य वर्तमान: वर्तमान में कार्य पूरा होने की संभावना। (शायद वह आया हो)।

5.2 भूतकाल (Past Tense)

बीता हुआ समय। इसके 6 उपभेद हैं:

  1. सामान्य भूत: क्रिया बीते समय में हुई। (उसने पढ़ा)।
  2. आसन्न भूत: कार्य अभी-अभी समाप्त हुआ है। (मैंने खाना खाया है)।
  3. पूर्ण भूत: कार्य बहुत पहले समाप्त हो चुका था। (अंग्रेज जा चुके थे)।
  4. अपूर्ण भूत: कार्य बीते समय में चल रहा था। (वह जा रहा था)।
  5. संदिग्ध भूत: कार्य के बीते समय में होने में संदेह हो। (उसने गाना गाया होगा)।
  6. हेतुहेतुमद भूत: जब एक भूतकालीन क्रिया दूसरी क्रिया पर निर्भर हो। (यदि वर्षा होती, तो फसल अच्छी होती)।

5.3 भविष्य काल (Future Tense)

आने वाला समय। इसके 3 उपभेद हैं:

  1. सामान्य भविष्य: आने वाले समय में क्रिया का सामान्य होना। (राम स्कूल जाएगा)।
  2. संभाव्य भविष्य: आने वाले समय में कार्य की संभावना। (शायद कल वर्षा हो)।
  3. हेतुहेतुमद भविष्य: भविष्य की एक क्रिया दूसरी पर निर्भर हो। (वह पढ़ेगा तो सफल होगा)।

भाग 6: हिंदी व्याकरण की गहरी समझ – विशेष विमर्श

6.1 वर्णों के उच्चारण स्थान की तालिका

वर्णों का सही उच्चारण ही वर्तनी की शुद्धता का आधार है।

उच्चारण स्थानवर्णसंज्ञा
कंठअ, आ, क-वर्ग, ह, विसर्गकंठ्य
तालुइ, ई, च-वर्ग, य, शतालव्य
मूर्धाऋ, ट-वर्ग, र, षमूर्ध्य
दंतत-वर्ग, ल, सदंत्य
ओष्ठउ, ऊ, प-वर्गओष्ठ्य
नासिकाङ, ञ, ण, न, म, अनुस्वारनासिक्य

6.2 विराम चिह्नों का महत्व (Punctuation)

वर्तनी और लेखन की शुद्धता में विराम चिह्नों की भूमिका अतुलनीय है।

  • पूर्ण विराम (।): वाक्य की समाप्ति पर।
  • अल्प विराम (,): थोड़ी देर रुकने के लिए।
  • अर्ध विराम (;): अल्प विराम से अधिक रुकने के लिए।
  • विस्मयादिबोधक (!): हर्ष, शोक या आश्चर्य के लिए।
  • योजक चिह्न (-): दो शब्दों को जोड़ने के लिए। जैसे: माता-पिता।

भाग 7: व्यवहारिक प्रयोग और उदाहरण विश्लेषण

हिंदी व्याकरण केवल नियमों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह वाक्यों में प्राण फूंकने का कार्य करता है। आइए कुछ जटिल वाक्यों में लिंग, वचन और काल के समन्वय को देखें।

वाक्य 1: “नदियाँ बह रही थीं।”

  • विश्लेषण: यहाँ ‘नदियाँ’ स्त्रीलिंग और बहुवचन है। इसीलिए क्रिया ‘बह रही थीं’ भी स्त्रीलिंग और बहुवचन में प्रयुक्त हुई है। काल ‘अपूर्ण भूत’ है।

वाक्य 2: “शायद राम पढ़ रहा होगा।”

  • विश्लेषण: यह ‘संदिग्ध वर्तमान’ काल का उदाहरण है। ‘राम’ पुल्लिंग एकवचन है, अतः क्रिया भी पुल्लिंग एकवचन है।

भाग 8: वर्तनी शुद्धि के स्वर्ण नियम

लेखन को प्रभावशाली बनाने के लिए निम्नलिखित १० नियमों का पालन अवश्य करें:

  1. श और ष का प्रयोग: हिंदी में ‘ष’ का प्रयोग केवल संस्कृत के तत्सम शब्दों में होता है। जैसे: वर्षा, कृषक।
  2. ड़ और ढ़ का नियम: ये वर्ण कभी भी किसी शब्द के शुरू में नहीं आते। जैसे: ‘सड़क’ सही है, लेकिन ‘ड़मरू’ गलत (डमरू सही है)।
  3. हलंत का प्रयोग: जब किसी व्यंजन को स्वर रहित लिखना हो, तो हलंत (्) लगाते हैं। जैसे: महान्, विद्वान्।
  4. विभक्ति चिह्न: संज्ञा शब्दों से विभक्ति चिह्न हमेशा अलग लिखे जाते हैं (राम ने, घर से), जबकि सर्वनाम के साथ जुड़कर लिखे जाते हैं (उसने, तुमसे)।
  5. संयुक्ताक्षर: ‘क्ष’, ‘ज्ञ’ और ‘श्र’ जैसे वर्णों का शुद्ध लेखन और उच्चारण बहुत आवश्यक है। ‘ज्ञ’ का वास्तविक उच्चारण ‘ज् + ञ’ (ज्र्ञ) है, लेकिन हिंदी में यह ‘ग्य’ जैसा उच्चारित होता है।
  6. अयोगवाह: ‘अं’ (अनुस्वार) और ‘अः’ (विसर्ग) न तो स्वर हैं और न ही व्यंजन। इन्हें ‘अयोगवाह’ कहा जाता है क्योंकि ये स्वर के बाद आते हैं।
  7. क्रिया का वचन परिवर्तन: “वे जा रहे हैं” में ‘हैं’ पर बिंदु (अनुस्वार) बहुवचन का सूचक है। एकवचन में यह “वह जा रहा है” होगा।
  8. लिंग निर्धारण का आधार: हिंदी में लिंग क्रिया के आधार पर पहचाना जाता है। जैसे: “दही खट्टा है।” यहाँ ‘है’ पुल्लिंग क्रिया होने के कारण ‘दही’ पुल्लिंग सिद्ध होता है।
  9. वचन का सम्मानजनक प्रयोग: आदर देने के लिए एकवचन संज्ञा के साथ भी बहुवचन क्रिया का प्रयोग किया जाता है। जैसे: “पिताजी आ रहे हैं।”
  10. विदेशी ध्वनियाँ: हिंदी में कुछ विदेशी ध्वनियाँ (क़, ख़, ग़, ज़, फ़) नुक्ता लगाकर लिखी जाती हैं, जिन्हें ‘आगत ध्वनियाँ’ कहते हैं।

भाग 9: व्याकरणिक जटिलताएं और उनके समाधान

अक्सर छात्र लिंग और वचन के अपवादों में भ्रमित हो जाते हैं।

अपवादों का विश्लेषण:

  1. लिंग के अपवाद: कतिपय शब्द देखने में स्त्रीलिंग लगते हैं पर होते पुल्लिंग हैं, जैसे—घी, दही, मोती, पानी, हाथी।
  2. वचन के अपवाद: कुछ शब्द हमेशा एकवचन में प्रयुक्त होते हैं, जैसे—जनता। आप यह नहीं कह सकते कि “जनता आ रहे हैं”, सही वाक्य होगा “जनता आ रही है”।
  3. काल का कालखंड: हेतुहेतुमद भूत और भविष्य में अंतर यह है कि भूतकाल में कार्य होने वाला था पर हुआ नहीं, जबकि भविष्य में होने की शर्त होती है।

भाग 10: निष्कर्ष और अभ्यास का महत्व

हिंदी व्याकरण की यह यात्रा स्वर से शुरू होकर काल की अनंत गहराइयों तक पहुँचती है। किसी भी भाषा पर अधिकार प्राप्त करने के लिए व्याकरण का सतत अभ्यास अनिवार्य है। देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता हमें यह सिखाती है कि हम जो सोचते हैं, उसे उसी शुद्धता के साथ कागज पर उतारें। स्वर, व्यंजन, वर्तनी, लिंग, वचन और काल—ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि भाषा की वह संरचना हैं जो समाज में संवाद को स्पष्ट और अर्थपूर्ण बनाती हैं।

यदि आप अपनी हिंदी को सुदृढ़ करना चाहते हैं, तो:

  1. प्रतिदिन हिंदी के मानक समाचार पत्र पढ़ें।
  2. वर्तनी की शुद्धता के लिए नियमित डिक्टेशन (श्रुतिलेख) लें।
  3. व्याकरणिक चार्ट्स बनाकर अपने अध्ययन कक्ष में लगाएँ।
  4. कठिन शब्दों के मूल (संस्कृत या तद्भव) को समझने का प्रयास करें।

हिंदी केवल हमारी मातृभाषा नहीं, हमारा गौरव है। इसकी शुद्धता बनाए रखना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है।


शब्दावली संदर्भ (Glossary)

  • Phonetics (ध्वनि विज्ञान): वर्णों के उच्चारण का विज्ञान।
  • Orthography (वर्तनी): लिखने का मानक ढंग।
  • Grammatical Gender (लिंग): संज्ञा की जाति।
  • Inflection (रूपान्तरण): लिंग या वचन के कारण शब्द में आने वाला बदलाव।
  • Etymology (व्युत्पत्ति): शब्दों के जन्म की कहानी।

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