HomeBlogChhattisgarh Folk Musical Instruments Guide 2026: लोक वाद्ययंत्रों का संपूर्ण परिचय और इतिहास [Full Guide]

Chhattisgarh Folk Musical Instruments Guide 2026: लोक वाद्ययंत्रों का संपूर्ण परिचय और इतिहास [Full Guide]

क्या आप जानते हैं कि छत्तीसगढ़ की माटी में संगीत बसता है? यहाँ सुबह की शुरुआत ‘भोरमदेव’ के मंत्रों से नहीं, बल्कि मोहरी की गूंज और मांदर की थाप से होती है।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति को “गीत और संगीत की संस्कृति” कहा जाता है। यहाँ के आदिवासी (Tribals) अपने सुख-दुःख, त्यौहार और अनुष्ठान सब कुछ संगीत के माध्यम से व्यक्त करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि तीजन बाई के हाथ में जो तंबूरा है, या देवदास बंजारे जिस मांदर की थाप पर पूरी दुनिया को नचाते थे, उनकी बनावट और इतिहास क्या है?

प्रतियोगी परीक्षाओं (CGPSC/Vyapam) से लेकर संगीत प्रेमियों तक, सबके लिए छत्तीसगढ़ के वाद्ययंत्रों को समझना जरुरी है। यह पोस्ट इंटरनेट पर उपलब्ध सबसे विस्तृत गाइड है, जहाँ हम 20 से अधिक वाद्ययंत्रों का ‘पोस्टमार्टम’ करेंगे।

Note: नीचे दी गई लिस्ट में ‘घनकुल’ और ‘गुदुम’ जैसे वाद्ययंत्र सबसे अनोखे हैं, जिनका निर्माण और बजाने का तरीका आपको हैरान कर देगा।


📋 Quick Summary (Instruments at a Glance)

समय कम है? तो यहाँ छत्तीसगढ़ के संगीत संसार का पूरा निचोड़ देखिये:

  • वर्गीकरण: 4 प्रकार (तत्, सुषिर, अवनद्ध, घन)।
  • सबसे लोकप्रिय: मांदर (Mandar) – लोक नृत्यों का राजा।
  • सबसे पवित्र: मोहरी (Mohri) – मांगलिक कार्यों के लिए।
  • सबसे अनोखा: गुदुम (Gudum) – इसमें बारहसिंगा के सींग लगे होते हैं।
  • पांडवानी विशेष: तंबूरा और खड़ताल।
  • मुख्य सामग्री: मिट्टी, लकड़ी (बीजा/सागौन), चमड़ा और धातु।

📊 Classification of Instruments (Data Table)

संगीत शास्त्र और आयोग (Commission) के अनुसार वाद्ययंत्रों का वर्गीकरण यहाँ एक नजर में देखें:

क्र.श्रेणी (Category)परिभाषा (Definition)प्रमुख उदाहरण (Examples)
1.तत् वाद्य (String)जिनमें तार (Strings) के कंपन से स्वर निकलते हैं।धनकुल, एकतारा, तंबूरा, चिकारा, किकरी।
2.सुषिर वाद्य (Wind)जिन्हें फूंक मारकर (हवा से) बजाया जाता है।मोहरी, अलगोजा, बांसुरी, तोड़ी, अकुम।
3.अवनद्ध वाद्य (Percussion)चमड़े से मढ़े हुए यंत्र, जिन्हें थाप देकर बजाते हैं।मांदर, ढोलक, नगाड़ा, गुदुम, दफड़ा, ताशा।
4.घन वाद्य (Solid/Metal)धातु या लकड़ी के ठोस यंत्र जो टकराने से बजते हैं।झांझ, मंजीरा, खड़ताल, चिटकुल, मुयांग।

🎶 Deep Dive: लोक वाद्ययंत्रों की दुनिया (विस्तृत विवरण)

आइये, अब हम संगीत शास्त्र के अनुसार चारों श्रेणियों और उनके अंतर्गत आने वाले वाद्ययंत्रों का विस्तृत (Deep Dive) अध्ययन करते हैं।


1. तत् वाद्य यंत्र (String Instruments)

‘तत्’ का अर्थ है तार। इस श्रेणी में वे वाद्ययंत्र आते हैं जिनमें ध्वनि का उत्पादन तने हुए तारों (Stretched Strings) को छेड़ने, रगड़ने या खींचने से होता है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में इनका प्रयोग गायन के साथ ‘सुर’ (Tune) देने के लिए किया जाता है।

A. धनकुल (Dhanakul) – सबसे विशिष्ट वाद्य
यह छत्तीसगढ़ का सबसे प्राचीन और विशिष्ट वाद्ययंत्र है। इसे ‘धनुष-वीणा’ का आदिम रूप माना जा सकता है।

  • संरचना: यह कोई एक बना-बनाया यंत्र नहीं है, बल्कि इसे बजाते समय संयोजित (Assemble) किया जाता है। इसमें चार मुख्य चीजें होती हैं:
    1. मिट्टी का घड़ा (Pot): जो ध्वनि गूंजने (Resonance) का काम करता है।
    2. सूप (Winnowing Fan): जो घड़े के मुंह पर रखा जाता है।
    3. धनुष (Bow): बांस की कमची से बना।
    4. छिपोरी (Bamboo Stick): जिससे रगड़कर आवाज़ निकाली जाती है।
  • प्रयोग: इसका प्रयोग मुख्य रूप से हलबा और भतरा जनजाति की महिलाएं ‘तीजा जगार’ और ‘लक्ष्मी जगार’ गीतों के दौरान करती हैं।
  • महत्व: यह वाद्ययंत्र तंत्र-मंत्र और देवी आह्वान से जुड़ा हुआ है। इसकी ध्वनि बहुत ही रहस्यमयी और गूंजदार होती है।

B. एकतारा (Ektara)
जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इसमें ‘एक तार’ होता है। यह सादगी का प्रतीक है।

  • बनावट: इसमें लौकी के सूखे तुम्बे (Gourd) में बांस का डंडा फंसाया जाता है और एक तार को कस दिया जाता है।
  • प्रयोग: यह भक्ति संगीत का आधार है। इसका प्रयोग छत्तीसगढ़ में भर्थरी गायन और पंडवानी के वेदमती शैली में किया जाता है। यह गायक को ‘आधार स्वर’ (Base Note) प्रदान करता है।

C. तंबूरा (Tambura)
यह एकतारा का ही विकसित रूप है, लेकिन थोड़ा बड़ा और भव्य होता है।

  • प्रसिद्धि: विश्व प्रसिद्ध पांडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई के हाथों में आपने इसे देखा होगा। तीजन बाई इसे न केवल वाद्ययंत्र की तरह बजाती हैं, बल्कि महाभारत के पात्रों (जैसे गदा, धनुष) के रूप में भी इसका अभिनय करती हैं।
  • बनावट: यह लकड़ी और बड़े तुम्बे से बना होता है। इसके तार लोहे या पीतल के होते हैं।

D. चिकारा (Chikara)
यह सारंगी जैसा दिखता है।

  • प्रयोग: इसका उपयोग मुख्य रूप से देवार जाति के लोग करते हैं। देवार गीत गाते समय वे चिकारा बजाते हैं। यह मध्य क्षेत्र और महासमुंद जिले में अधिक प्रचलित है।

E. किंगरी/किकरी:
यह भी सारंगी की तरह होता है जिसे गज (Bow) की सहायता से बजाया जाता है। यह गोंड और प्रधान जनजाति का प्रिय वाद्य है। वे अपने ‘गोंगों’ (देवता) को प्रसन्न करने के लिए इसे बजाते हैं।


2. सुषिर वाद्य यंत्र (Wind Instruments)

‘सुषिर’ का अर्थ है सुराख या छेद। ये वे वाद्ययंत्र हैं जो फूंक (हवा) के दबाव से बजते हैं। इनमें बांस या धातु की नली होती है।

A. मोहरी (Mohri) – छत्तीसगढ़ की शहनाई
यह छत्तीसगढ़ का सबसे सुरीला और मंगलकारी वाद्ययंत्र है।

  • उपनाम: इसे ‘छत्तीसगढ़ की शहनाई’ कहा जाता है।
  • बनावट: यह सागौन या बीजा लकड़ी से बनी होती है। इसके मुख पर पीतल का एक घेरा (Brass Cup) लगा होता है जिसे ‘फूल’ कहते हैं। इसमें ताड़ के पत्तों की ‘पत्ती’ (Reed) लगाई जाती है, जिससे आवाज़ निकलती है। इसमें 7 छेद होते हैं।
  • प्रयोग: शादी-ब्याह, छठी, नामकरण और मड़ई-मेले में इसके बिना कोई भी कार्य अधूरा माना जाता है। यह ‘गंडवा बाजा’ का मुख्य स्वर वाद्य है।

B. अलगोजा (Algoza) – बांसुरी का जोड़ा
यह बांसुरी का एक अनोखा रूप है।

  • संरचना: इसमें दो बांसुरियां एक साथ मुंह में रखकर बजाई जाती हैं। एक बांसुरी से निरंतर ‘सुर’ (Drone) निकलता है और दूसरी से ‘राग’ (Melody) बजती है।
  • कलाकार: प्रसिद्ध लोक गायिका सुरूज बाई खांडे ने भरथरी गायन में अलगोजा का अद्भुत प्रयोग किया है।
  • संबंध: यह मुख्य रूप से यादव (राउत) और गड़रिया जाति के लोगों का वाद्य है। पशु चराते समय वे इसे बजाते हैं।

C. बांसुरी (Flute)
यह दुनिया का सबसे पुराना वाद्य है। छत्तीसगढ़ में खोखले बांस से बनी बांसुरी चरवाहों की पहचान है।

  • बनावट: बांस में 6 या 7 छेद करके इसे बनाया जाता है।
  • प्रयोग: लोक प्रेम गाथाओं (जैसे अहिमन रानी, लोरिक चंदा) में बांसुरी की धुन का विशेष महत्व है।

D. अकुम (Akum) और तोड़ी:

  • अकुम: यह स्वयं जमे हुए भैंसे के सींग से बना होता है। यह एक बिगुल की तरह काम करता है। इसका प्रयोग शिकार के समय संकेत देने या नर्तकों को जोश दिलाने के लिए किया जाता है।
  • तोड़ी: यह भी एक प्रकार का सुषिर वाद्य है जो पीतल या अन्य धातु से बना होता है।

E. करना (Karna):
यह एक बहुत लंबी तुरही (Trumpet) जैसा होता है। इसे ‘गंडवा बाजा’ समूह में बजाया जाता है। इसकी आवाज़ बहुत तेज और भारी होती है जो दूर तक सुनाई देती है।


3. अवनद्ध वाद्य यंत्र (Percussion Instruments)

‘अवनद्ध’ का अर्थ है ढका हुआ। ये वे वाद्ययंत्र हैं जिनमें लकड़ी या धातु के खोल पर चमड़ा मढ़ा जाता है। इन्हें हाथ या डंडे से पीटने पर आवाज़ आती है। ये ‘ताल’ (Rhythm) देते हैं।

A. मांदर (Mandar) – लोक नृत्यों का राजा
यह छत्तीसगढ़ का सबसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय वाद्ययंत्र है। इसके बिना कर्मा, सुआ या पंथी नृत्य की कल्पना नहीं की जा सकती।

  • निर्माण: यह मिट्टी या लकड़ी (बीजा/खम्हार) के खोखले बेलनाकार खोल से बनता है।
  • गाब (Siyahi): इसके दोनों ओर बकरे का चमड़ा मढ़ा जाता है। एक सिरा छोटा और दूसरा बड़ा होता है। बड़े सिरे पर चावल के माड़ और जले हुए टायर/राख का लेप लगाया जाता है जिसे ‘गाब’ कहते हैं। इससे आवाज़ में भारीपन (Bass) आता है।
  • प्रसिद्धि: प्रख्यात पंथी नर्तक स्व. देवदास बंजारे जब मांदर टांगकर थिरकते थे, तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
  • जनजाति: यह गोंड, उरांव, बैगा और सतनामी समाज का प्रमुख वाद्य है। इसे गले में टांगकर बजाया जाता है।

B. गुदुम / सिंग बाजा (Gudum/Sing Baja)
यह दिखने में बहुत ही आक्रामक और आकर्षक वाद्य है।

  • पहचान: इसमें लोहे या मिट्टी के अर्ध-गोलाकार (कड़ाही नुमा) ढांचे पर चमड़ा मढ़ा होता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बारहसिंगा के दो बड़े सींग लगे होते हैं।
  • सजावट: सींगों को मोर पंख और कौड़ियों से सजाया जाता है।
  • प्रयोग: इसे कमर में बांधकर दो डंडियों से बजाया जाता है। यह मुख्य रूप से ध्रुवा जनजाति और यादवों (राउत नाचा) द्वारा बजाया जाता है। इसकी आवाज़ युद्ध के नगाड़े जैसी होती है।

C. नगाड़ा (Nagada)
यह आकार में बड़ा होता है और अक्सर जोड़े में होता है (एक छोटा, एक बड़ा)।

  • प्रयोग: होली के समय फाग गीतों में नगाड़े की गूंज अनिवार्य है। इसके अलावा आदिवासी इसे अपने देवताओं की पूजा के समय बजाते हैं। यह ‘गंडवा बाजा’ का हिस्सा है।
  • बनावट: इसे भैंसे की मोटी खाल से मढ़ा जाता है और लकड़ी के मोटे डंडों से पीटा जाता है।

D. ढोलक (Dholak)
यह एक आम वाद्ययंत्र है जो पूरे भारत में पाया जाता है।

  • छत्तीसगढ़ में: यहाँ जस गीत, भोजली और पंडवानी में ढोलक का संगत बहुत महत्वपूर्ण है। यह आम, बीजा या शीशम की लकड़ी से बनता है।

E. दफड़ा / चांग (Dafra/Chang)
यह एक तरफ से मढ़ा हुआ वाद्य है (Frame Drum)।

  • बनावट: लकड़ी के गोलाकार घेरे (व्यास) पर एक तरफ बकरे या गाय की खाल मढ़ी जाती है।
  • प्रयोग: इसे कंधे पर लटकाकर या हाथ में पकड़कर बजाया जाता है। यह विशेषकर होली, जस गीत और माओ-पाटा नृत्य में बजाया जाता है।
  • सरहुल: उरांव जनजाति सरहुल नृत्य के समय मांदर के साथ दफड़ा भी बजाती है।

F. टिमटिमी / टिमकी (Timtimi)
यह नगाड़े का ही एक छोटा रूप है।

  • बनावट: मिट्टी या लकड़ी के छोटे कटोरे नुमा ढांचे पर खाल मढ़ी होती है।
  • वादक: इसे दो पतली कमचियों (Sticks) से बजाया जाता है। इसकी आवाज़ बहुत तीखी और तेज होती है जो मांदर या नगाड़े की भारी आवाज़ को काटती है। यह लय को गति (Speed) देने का काम करती है।

G. ताशा (Tasha)
यह मुस्लिम संस्कृति से आया है लेकिन अब छत्तीसगढ़ी लोक वाद्य का हिस्सा है।

  • प्रयोग: मोहर्रम के ताजिये और शादी-ब्याह के जुलूस में ताशा बजाया जाता है। इसे गले में लटकाकर दो पतली डंडियों से बहुत तेजी से बजाया जाता है।

H. खंजरी (Khanjari)
यह डफली जैसा छोटा वाद्य है। इसमें अक्सर ‘गोह’ (Monitor Lizard) की खाल का प्रयोग होता है, जो इसे विशेष बनाता है।


4. घन वाद्य यंत्र (Solid/Idiophone Instruments)

‘घन’ का अर्थ है ठोस। ये वे वाद्य हैं जो धातु या लकड़ी के बने होते हैं और जिन्हें आपस में टकराने या चोट मारने से ध्वनि निकलती है। ये मुख्य रूप से ‘ताल’ (Rhythm) और ‘टेम्पो’ को बनाए रखने में मदद करते हैं।

A. झांझ (Jhanjh)
यह मंजीरा का बड़ा और भारी रूप है।

  • प्रयोग: यह पंथी नृत्य, राउत नाचा और फाग गीतों में बजाया जाता है। जब नर्तक इसे जोर से टकराते हैं, तो एक छनछनाती हुई तेज आवाज़ निकलती है जो जोश भर देती है।

B. मंजीरा (Manjira)
यह पीतल या कांसे का बना छोटा गोलाकार वाद्य है।

  • प्रयोग: यह भजन, जस गीत और पंडवानी में मुख्य गायक के साथ संगत देने के लिए प्रयुक्त होता है। यह भक्ति रस का वाद्य है।

C. खड़ताल (Khartal)
इसका नाम ‘कर’ (हाथ) और ‘ताल’ (लय) से बना है।

  • बनावट: यह लकड़ी के दो टुकड़ों से बना होता है जिनके बीच में पीतल की छोटी-छोटी चकतियां (Jingles) लगी होती हैं।
  • प्रयोग: पंडवानी गायक (विशेषकर कापालिक शैली) इसे हाथ में पकड़कर बजाते हैं। यह संवाद अदायगी के समय नाटकीयता पैदा करता है।

D. चिटकुल (Chitkul)
यह भी मंजीरा जैसा ही होता है। बस्तर क्षेत्र में इसे विशेष रूप से माड़िया जनजाति के लोग बजाते हैं।

E. मुयांग (Muyang)
गोंडी भाषा में ‘घंटी’ को मुयांग कहते हैं।

  • महत्व: यह वाद्ययंत्र से ज्यादा एक धार्मिक प्रतीक है। आदिवासी अपने कमर में या नृत्यों के दौरान डंडों में घंटियां बांधते हैं। घंटी की आवाज़ से बुरी आत्माएं दूर भागती हैं।

F. काठी (Kathi):
लकड़ी के दो डंडों को आपस में टकराकर लय बनाई जाती है। सुआ नृत्य और डंडा नृत्य में ‘काठी’ ही घन वाद्य का काम करती है।


🥁 The “Gandwa Baja” (गंडवा बाजा) – एक संपूर्ण ऑर्केस्ट्रा

छत्तीसगढ़ के वाद्ययंत्रों की बात हो और ‘गंडवा बाजा’ का जिक्र न हो, यह संभव नहीं। यह कोई एक वाद्य नहीं, बल्कि वाद्ययंत्रों का एक समूह (Ensemble) है।

  • क्या है: यह छत्तीसगढ़ का पारंपरिक बैंड (Traditional Band) है।
  • जाति: इसे मुख्य रूप से ‘गंडा’ जाति के लोगों द्वारा बजाया जाता है, इसलिए इसे गंडवा बाजा कहते हैं।
  • शामिल वाद्य: इसमें आमतौर पर 5 प्रमुख वाद्य होते हैं (पंच वाद्य):
    1. मोहरी: (मुख्य स्वर)
    2. दफड़ा: (मुख्य ताल)
    3. टिमकी: (पूरक ताल)
    4. निशान/गुदुम: (भारी बास)
    5. झांझ/मंजीरा: (लय)
  • अवसर: शादी के बारात, देवी-देवताओं की सवारी, मड़ई-मेला और राऊत नाचा में गंडवा बाजा की धुन पर ही लोग थिरकते हैं।

✅ Pros & Cons: वाद्ययंत्रों का संरक्षण (Trust Box)

आधुनिकता की दौड़ में इन वाद्ययंत्रों की स्थिति को समझना जरुरी है:

💚 The Good (सकारात्मक पक्ष)🛑 The Bad (चुनौतियां)
सांस्कृतिक पहचान: ये वाद्ययंत्र छत्तीसगढ़ की आत्मा हैं। मांदर की थाप सुनते ही छत्तीसगढ़िया व्यक्ति का पैर थिरकने लगता है।कच्चे माल की कमी: मांदर या दफड़ा बनाने के लिए विशिष्ट लकड़ी और जानवरों की खाल की जरुरत होती है, जो वन कानूनों के कारण मिलना मुश्किल हो गया है।
विश्व पटल पर: तीजन बाई और देवदास बंजारे जैसे कलाकारों ने तंबूरा और मांदर को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है।डीजे (DJ) संस्कृति: शादियों और विसर्जन में अब गंडवा बाजा की जगह तेज आवाज़ वाले डीजे ने ले ली है, जिससे पारंपरिक कलाकारों की आजीविका खतरे में है।
पर्यटन: बस्तर के आदिवासी वाद्ययंत्र (जैसे गुदुम) पर्यटकों को बहुत आकर्षित करते हैं।कारीगरों की कमी: इन वाद्ययंत्रों को बनाने वाले कुशल कारीगरों की नई पीढ़ी इस काम से दूर हो रही है।

❓ Frequently Asked Questions (FAQ)

प्रतियोगी परीक्षाओं और सामान्य ज्ञान के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न:

Q1: छत्तीसगढ़ का ‘सुषिर वाद्य’ मोहरी किसकी तरह दिखता है?
Ans: मोहरी बनावट और ध्वनि में शहनाई के समान है। इसे मांगलिक कार्यों में बजाया जाता है।

Q2: तीजन बाई किस वाद्ययंत्र का प्रयोग करती हैं?
Ans: तीजन बाई तंबूरा (Tambura) और खड़ताल का प्रयोग करती हैं। तंबूरा उनके अभिनय का एक अनिवार्य हिस्सा है।

Q3: ‘धनकुल’ वाद्ययंत्र किस अवसर पर बजाया जाता है?
Ans: धनकुल मुख्य रूप से तीजा जगार और लक्ष्मी जगार के समय हलबा/भतरा जनजाति की महिलाओं द्वारा बजाया जाता है।

Q4: किस वाद्ययंत्र में बारहसिंगा के सींग लगे होते हैं?
Ans: गुदुम (Gudum) या सिंग बाजा में। यह ऊर्जा और शौर्य का प्रतीक है।

Q5: अलगोजा वाद्ययंत्र किससे संबंधित है?
Ans: यह यादव (राउत) जाति से संबंधित है। यह बांसुरी का एक युग्म (जोड़ा) है।


👋 Conclusion (निष्कर्ष)

छत्तीसगढ़ के लोक वाद्ययंत्र (Folk Instruments) केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये यहाँ की जन-जातीय अस्मिता, धर्म और दर्शन का प्रतिबिंब हैं।

जब एक आदिवासी ‘मांदर’ पर थाप देता है, तो वह केवल चमड़े को नहीं पीट रहा होता, बल्कि वह अपने पूर्वजों, प्रकृति और देवताओं से संवाद कर रहा होता है। ‘धनकुल’ की रहस्यमयी आवाज़ हो या ‘मोहरी’ की मंगल ध्वनि, ये सब मिलकर छत्तीसगढ़ को ‘जीवंत’ बनाते हैं।

आज आवश्यकता है कि हम डीजे की शोर-शराबे वाली दुनिया में अपने इन पारंपरिक, सुरीले और मिट्टी से जुड़े वाद्ययंत्रों को न भूलें। इनका संरक्षण ही हमारी संस्कृति का संरक्षण है।

आपकी राय:
क्या आपने कभी ‘गंडवा बाजा’ की धुन पर डांस किया है? या कभी ‘धनकुल’ की आवाज़ सुनी है?
अपने अनुभव नीचे Comment Box में जरूर साझा करें! 👇

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