प्रस्तुतकर्ता: श्री पुनाराम साहू सर (अंधियारखोर) के मार्गदर्शन में तैयार
आज की डिजिटल दुनिया में कम्प्यूटर केवल एक मशीन नहीं, बल्कि हमारी कार्यक्षमता का विस्तार है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी स्क्रीन पर दिखने वाले रंग कहाँ से आते हैं? या आपकी वर्षों पुरानी फोटो हार्ड डिस्क में कैसे सुरक्षित रहती है? कम्प्यूटर विज्ञान के इन रहस्यों को समझने के लिए हमें इसके ‘हार्डवेयर’ और ‘स्टोरेज डिवाइस’ की गहराई में उतरना होगा। इस वृहद् लेख में हम मॉनीटर के प्रकार, उनके कार्य करने के तरीके, और सेकेंडरी स्टोरेज की दुनिया का ५००० से अधिक शब्दों में विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
भाग 1: डिस्प्ले डिवाइसेज – कम्प्यूटर की आँखें (Monitor/Visual Display Unit)
मॉनिटर कम्प्यूटर का मुख्य आउटपुट डिवाइस है, जो हमें प्रोसेस किए गए डेटा को चित्रों या टेक्स्ट के रूप में दिखाता है। तकनीक के विकास के साथ इसके स्वरूप में भारी बदलाव आए हैं।
1.1 CRT मॉनीटर (Cathode Ray Tube)
यह सबसे पारंपरिक प्रकार का मॉनीटर है, जो काफी हद तक पुराने टेलीविजन जैसा दिखता है।
- बनावट: इसमें पीछे की ओर एक वैक्यूम ट्यूब (CRT) होती है। इसके भीतर एक फिलामेंट होता है जो गर्म होकर इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करता है।
- कार्यविधि: CRT के अंदर तीन इलेक्ट्रॉन गन होती हैं जो RGB (Red, Green, Blue) रंगों की किरणें छोड़ती हैं। एक ‘फोकसिंग डिवाइस’ इन किरणों को सीधी रेखा में रखता है और ‘मैग्नेटिक डिफ्लेक्शन कॉइल’ इन्हें स्क्रीन की दिशा तय करने में मदद करती है।
- फास्फोरस कोटिंग: मॉनीटर की स्क्रीन पर फास्फोरस का लेप होता है। जब इलेक्ट्रॉन इस कोटिंग से टकराते हैं, तो वह हिस्सा चमकने (Glow) लगता है, जिससे हमें चित्र दिखाई देता है।
- रास्टर स्कैनिंग (Raster Scan): इलेक्ट्रॉन बीम स्क्रीन के ऊपरी बाएँ कोने (0,0) से शुरू होकर ‘Z’ आकृति में पूरी स्क्रीन पर घूमती है। इस गति को ‘रास्टर’ कहते हैं।
1.2 LCD (Liquid Crystal Display)
आजकल के लैपटॉप और डेस्कटॉप में LCD का सर्वाधिक उपयोग होता है।
- तकनीक: इसमें दो कांच की परतों के बीच एक पारदर्शी द्रवीय पदार्थ (Liquid Crystal) भरा होता है। इसकी बाहरी परत पर टिन ऑक्साइड की कोटिंग होती है।
- लाभ: यह CRT के मुकाबले बहुत कम बिजली खाता है और आकार में पतला व हल्का होता है।
- हानि: यह CRT से महंगा होता है और इसका ‘व्यूइंग एंगल’ (Viewing Angle) सीमित हो सकता है।
1.3 प्लाज्मा मॉनीटर (Plasma Monitor)
यह एक अत्यंत पतला डिस्प्ले सिस्टम है।
- बनावट: कांच की दो शीट्स के बीच नियोन (Neon) या जेनन (Xenon) गैस भरी होती है। जब इन गैसों को इलेक्ट्रॉड के माध्यम से विद्युतीकृत किया जाता है, तो ये ‘प्लाज्मा’ अवस्था में आ जाती हैं और चमकने लगती हैं। प्रत्येक ग्रिड बिंदु एक पिक्सेल की तरह कार्य करता है।
1.4 अन्य विशिष्ट मॉनीटर
- पेपर-व्हाइट मॉनीटर: इनका उपयोग डेस्कटॉप पब्लिशिंग (DTP) और समाचार पत्र डिजाइनिंग में होता है क्योंकि ये श्वेत बैकग्राउंड और काले टेक्स्ट के बीच उच्च कन्ट्रास्ट प्रदान करते हैं।
- इलेक्ट्रोल्यूमिनेसेन्ट डिस्प्ले: यह LCD जैसा ही है, लेकिन इसमें कांच की परतों के बीच फास्फोरेसेन्ट फिल्म का उपयोग होता है, जो बिजली मिलने पर चमकती है।
भाग 2: मॉनीटर के मुख्य तकनीकी लक्षण (Characteristics)
एक अच्छे मॉनीटर की गुणवत्ता को मापने के लिए कुछ मापदंड होते हैं:
- रेजोल्यूशन (Resolution): स्क्रीन पर मौजूद छोटे-छोटे बिंदुओं (Dots) को ‘पिक्सेल’ (Pixel) कहते हैं। स्क्रीन के प्रति इकाई क्षेत्रफल में पिक्सेलों की कुल संख्या रेजोल्यूशन कहलाती है। उदाहरण के लिए, 1280 x 1024 रेजोल्यूशन का अर्थ है 1280 कॉलम और 1024 पंक्तियाँ। जितना ज्यादा रेजोल्यूशन, उतना स्पष्ट चित्र।
- रिफ्रेश रेट (Refresh Rate): स्क्रीन के पिक्सेल केवल कुछ समय के लिए चमकते हैं। उन्हें बार-बार चमकाने की प्रक्रिया ‘रिफ्रेश’ कहलाती है। इसे हर्ट्ज (Hz) में मापा जाता है। आधुनिक मानक 75Hz या उससे अधिक है। रिफ्रेश रेट कम होने पर स्क्रीन ‘फ्लिकर’ (Flicker) करती है।
- डॉट पिच (Dot Pitch): दो पिक्सेलों के बीच की लंबवत दूरी को डॉट पिच कहते हैं। यह जितनी कम होगी, चित्र की गुणवत्ता उतनी ही बेहतर होगी। सामान्य रेंज 0.15mm से 0.30mm होती है।
- बिट मैपिंग (Bit Mapping): यह तकनीक ग्राफ़िक्स आउटपुट दिखाने के लिए उपयोग की जाती है, जहाँ ऑपरेटर स्क्रीन के प्रत्येक पिक्सेल को नियंत्रित कर सकता है।
भाग 3: वीडियो मानक (Video Standards/Display Modes)
कम्प्यूटर की वीडियो तकनीक समय के साथ विकसित हुई है:
- CGA (1981): केवल 4 रंगों का समर्थन (320×200 पिक्सेल)।
- EGA (1984): 16 रंगों का समर्थन।
- VGA (1987): 256 रंगों के साथ 640×480 रेजोल्यूशन।
- SVGA (Super VGA): लाखों रंगों का समर्थन और 1280×1024 तक का रेजोल्यूशन।
भाग 4: सेकेंडरी स्टोरेज – डेटा का सुरक्षित बैंक (Secondary Memory)
प्राइमरी मेमोरी (RAM) अस्थायी होती है, इसलिए डेटा को हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए ‘सेकेंडरी स्टोरेज डिवाइस’ की आवश्यकता होती है।
4.1 सेकेंडरी स्टोरेज के लाभ
- विशाल क्षमता: टेराबाइट्स (TB) में डेटा स्टोर किया जा सकता है।
- स्थायित्व (Non-Volatile): बिजली जाने पर भी डेटा नष्ट नहीं होता।
- गमनीयता (Portability): पेन ड्राइव या हार्ड डिस्क को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना आसान है।
- कम लागत: RAM की तुलना में यह बहुत सस्ती होती है।
भाग 5: प्रमुख स्टोरेज डिवाइस का विस्तृत विवरण
5.1 फ्लॉपी डिस्क (Floppy Disk/Diskette)
यह माइलर प्लास्टिक की एक वृत्ताकार चकती होती है, जिस पर चुंबकीय पदार्थ का लेप होता है।
- बनावट: इसमें ‘राइट प्रोटेक्ट नॉच’ होता है। यदि इसे बंद कर दिया जाए, तो डेटा केवल पढ़ा जा सकता है, उसमें बदलाव नहीं किया जा सकता।
- आकार: 3.50 इंच वाली फ्लॉपी की क्षमता 1.44 MB होती है।
- सीमा: यह बहुत जल्दी खराब हो जाती है और इसकी क्षमता बहुत कम होती है, इसलिए अब यह चलन से बाहर है।
5.2 हार्ड डिस्क (Hard Disk Drive – HDD)
इसे ‘विंचेस्टर डिस्क’ भी कहते हैं। यह कम्प्यूटर का मुख्य भंडारण उपकरण है।
- बनावट: इसमें धातु की कई प्लेटें (Platters) एक शाफ्ट में लगी होती हैं। ये 3600 से 7200 RPM की गति से घूमती हैं।
- एक्सेस टाइम: डेटा को ढूँढने में लगने वाले समय को ‘एक्सेस टाइम’ कहते हैं। यह Seek Time (सही ट्रैक तक पहुँचना) और Latency Time (सही सेक्टर तक पहुँचना) का योग होता है।
- सिलिंडर: हार्ड डिस्क में एक के ऊपर एक स्थित ट्रैक्स के समूह को सिलिंडर कहा जाता है।
5.3 मैग्नेटिक टेप (Magnetic Tape)
यह पुराने ऑडियो कैसेट जैसा होता है। यह एक प्लास्टिक रिबन है जिस पर चुंबकीय लेप होता है।
- एक्सेस मेथड: यह Sequential Access (क्रमानुसार) माध्यम है। यदि आपको 10वें गाने पर जाना है, तो पहले 9 गानों से होकर गुजरना पड़ेगा।
- उपयोग: इसका उपयोग बड़े डेटा के बैकअप के लिए किया जाता है क्योंकि यह बहुत सस्ता होता है।
भाग 6: ऑप्टिकल मीडिया – लेजर तकनीक का जादू (Optical Disks)
1990 के दशक में आई यह तकनीक लेजर किरणों का उपयोग करके डेटा पढ़ती और लिखती है।
6.1 CD-ROM (Compact Disk)
- क्षमता: लगभग 700 MB।
- तकनीक: लेजर किरणें डिस्क की सतह पर छोटे छिद्र बनाती हैं जिन्हें Pit (1 bit) कहते हैं और समतल भाग को Land (0 bit) कहते हैं।
- प्रकार: CD-R (केवल एक बार लिखने योग्य) और CD-RW (बार-बार मिटाकर लिखने योग्य)।
6.2 ब्लू-रे डिस्क (Blu-Ray Disc – BD)
यह अगली पीढ़ी का ऑप्टिकल डिस्क फॉर्मेट है।
- क्षमता: सिंगल लेयर पर 25GB और डुअल लेयर पर 50GB।
- ब्लू लेजर: सामान्य DVD रेड लेजर का उपयोग करती है, जबकि यह ब्लू-वायलेट लेजर (405nm) का उपयोग करती है। ब्लू लेजर की वेवलेंथ छोटी होती है, जिससे डेटा को बहुत सघन (Dense) तरीके से स्टोर किया जा सकता है।
भाग 7: फ्लैश मेमोरी और मेमोरी कार्ड (Flash Memory)
आजकल के स्मार्टफोन और कैमरों में इनका प्रयोग होता है।
- विशेषता: इसमें कोई भी हिलने वाला पुर्जा (Moving Parts) नहीं होता, इसलिए यह झटकों के प्रति प्रतिरोधी होती है।
- प्रकार: SD कार्ड, माइक्रो SD कार्ड, कॉम्पैक्ट फ्लैश (CF) आदि।
भाग 8: डेटा ट्रांसफर और कनेक्टिविटी – DSL तकनीक
DSL (Digital Subscriber Line) एक ऐसी तकनीक है जो सामान्य टेलीफोन लाइनों के माध्यम से हाई-स्पीड इंटरनेट प्रदान करती है।
- ADSL (Asymmetric DSL): इसमें डाउनलोडिंग स्पीड अपलोडिंग से अधिक होती है। यह घरेलू उपयोग के लिए सबसे लोकप्रिय है।
- कार्यप्रणाली: यह फोन लाइन को दो बैंड्स में बांट देती है—एक आवाज (Voice) के लिए और दूसरा डेटा के लिए। इसके लिए ‘DSL फिल्टर’ का उपयोग किया जाता है।
भाग 9: डेटा एक्सेस की विधियाँ (Data Storage & Retrieval Methods)
- Sequential Access (क्रमिक): डेटा एक के बाद एक मिलता है (जैसे मैग्नेटिक टेप)।
- Direct/Random Access (सीधा): आप सीधे किसी भी डेटा पर पहुँच सकते हैं (जैसे हार्ड डिस्क, रैम)।
- ISAM (Indexed Sequential Access Method): इसमें डेटा क्रम में होता है, लेकिन जल्दी ढूँढने के लिए ‘इंडेक्स टेबल’ का प्रयोग किया जाता है।
भाग 10: जिप ड्राइव (Zip Drive)
यह भी एक पुराने समय का बैकअप उपकरण है। यह एक उच्च क्षमता वाली फ्लॉपी डिस्क जैसी होती है जो 100MB से 250MB तक डेटा स्टोर कर सकती थी। अब इसका स्थान क्लाउड और पेन ड्राइव ने ले लिया है।
भाग 11: निष्कर्ष और भविष्य की तकनीक
कम्प्यूटर हार्डवेयर और स्टोरेज की यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि कैसे हमने भारी-भरकम CRT और कम क्षमता वाली फ्लॉपी से निकलकर आज ‘क्वांटम कम्प्यूटिंग’ और ‘क्लाउड स्टोरेज’ की दुनिया में कदम रखा है। भविष्य में हम Holographic Storage और DNA Data Storage जैसी तकनीकों को देखेंगे, जहाँ एक छोटी सी बूंद में पूरी दुनिया का डेटा समा सकेगा।
श्री पुनाराम साहू सर के मार्गदर्शन में हमारा उद्देश्य आपको इन तकनीकी बारीकियों से अवगत कराना है ताकि आप न केवल कम्प्यूटर का उपयोग करें, बल्कि उसके पीछे के विज्ञान को भी समझें।
💡 महत्वपूर्ण परीक्षोपयोगी तथ्य (Quick Points)
- CRT का फुल फॉर्म Cathode Ray Tube है।
- RGB का अर्थ Red, Green, Blue है, जो स्क्रीन के प्राथमिक रंग हैं।
- HDD को विंचेस्टर डिस्क भी कहा जाता है।
- VGA मानक का विकास IBM ने 1987 में किया था।
- ब्लू-रे डिस्क में डेटा पढ़ने के लिए 405nm की वेवलेंथ वाली लेजर का उपयोग होता है।
- DSL का अर्थ Digital Subscriber Line है।
- WORM का अर्थ Write Once Read Many है (जैसे CD-R)।
- हार्ड डिस्क की गति RPM (Rotations Per Minute) में मापी जाती है।
इस लेख को अपने मित्रों और विद्यार्थियों के साथ साझा करें। कम्प्यूटर विज्ञान की निरंतर विकसित होती इस दुनिया में अपडेट रहना ही सफलता की कुंजी है।
साभार:
श्री पुनाराम साहू
अंधियारखोर, नवागढ़, बेमेतरा (छ.ग.)
संपर्क: 7509018151
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