HomeBlogउपनिषद और ब्रह्मज्ञान का दर्शन: भारतीय आध्यात्मिकता की आत्मा और वैश्विक चेतना का मूल

उपनिषद और ब्रह्मज्ञान का दर्शन: भारतीय आध्यात्मिकता की आत्मा और वैश्विक चेतना का मूल

भूमिका: सत्य की सनातन खोज
जब हम भारतीय संस्कृति और दर्शन की बात करते हैं, तो हमारे सामने एक ऐसा हिमालय खड़ा होता है जिसका शिखर बादलों के पार सत्य के प्रकाश में चमक रहा है। वह शिखर है—उपनिषद। हज़ारों साल पहले, गंगा के तटों पर और हिमालय की गुफाओं में ऋषियों ने जो ‘मौन का संगीत’ सुना, वही उपनिषदों के रूप में हमारे पास उपलब्ध है। उपनिषद केवल ग्रंथ नहीं हैं, वे मानव चेतना के उच्चतम उत्कर्ष की घोषणाएँ हैं।


अध्याय 1: उपनिषद का अर्थ और दार्शनिक पृष्ठभूमि

1.1 शब्द की व्युत्पत्ति और गहराई

‘उपनिषद’ शब्द तीन शब्दों के मेल से बना है:

  1. उप (Upa): समीप (Near)
  2. नि (Ni): श्रद्धापूर्वक/निश्चयपूर्वक (Devotedly)
  3. सद् (Sad): बैठना (To sit)

इसका शाब्दिक अर्थ है—”गुरु के चरणों में श्रद्धापूर्वक बैठकर प्राप्त किया गया रहस्यमयी ज्ञान।” लेकिन दार्शनिक रूप से, शंकराचार्य ने ‘सद्’ धातु के तीन अर्थ बताए हैं:

  • विशरण: अज्ञान का नाश करना।
  • गति: ब्रह्म की प्राप्ति कराना।
  • अवसादन: दुखों का अंत करना।

अर्थात, उपनिषद वह विद्या है जो साधक के अज्ञान को जड़ से उखाड़ देती है और उसे उस आनंदमय ब्रह्म से जोड़ देती है जहाँ से लौटकर फिर जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं गिरना पड़ता।

1.2 वेदों से उपनिषदों तक की यात्रा: कर्मकांड से ज्ञानकांड

वेदों के चार भाग होते हैं: संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद।

  • संहिता और ब्राह्मण: यहाँ यज्ञ, देवताओं की स्तुति और कर्मकांड की प्रधानता है।
  • आरण्यक: यहाँ वन के एकांत में प्रतीकात्मक यज्ञों और ध्यान की चर्चा है।
  • उपनिषद: यह वेदों का अंतिम भाग है, जिसे वेदांत कहा जाता है। यहाँ कर्मकांड पूरी तरह समाप्त हो जाता है और केवल ‘ज्ञान’ शेष बचता है। यह वह बिंदु है जहाँ मनुष्य ईश्वर को बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर खोजना शुरू करता है।

अध्याय 2: प्रमुख 10 उपनिषद और उनका सार

मुक्ति उपनिषद के अनुसार कुल 108 उपनिषद हैं, लेकिन शंकराचार्य ने जिन 10 पर भाष्य लिखा, उन्हें ‘मुख्य उपनिषद’ माना जाता है।

2.1 ईश उपनिषद: त्याग और भोग का संतुलन

यह शुक्ल यजुर्वेद का अंतिम अध्याय है। इसका पहला ही मंत्र जीवन का आधार है:
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥”
अर्थात: यह समस्त ब्रह्मांड ईश्वर से व्याप्त है। इसका त्यागपूर्वक भोग करो, किसी के धन का लोभ मत करो। यह उपनिषद सिखाता है कि आध्यात्मिक जीवन और सांसारिक कर्मों में विरोध नहीं है।

2.2 केन उपनिषद: वह कौन है?

‘केन’ का अर्थ है “किसके द्वारा”। शिष्य पूछता है—आँखें किसके द्वारा देखती हैं? कान किसके द्वारा सुनते हैं? प्राण किसके द्वारा चलते हैं? उत्तर मिलता है—वह ‘ब्रह्म’ है, जो आँखों की आँख और कानों का कान है। जिसे मन नहीं जान सकता, बल्कि जिससे मन जाना जाता है, वही ब्रह्म है।

2.3 कठ उपनिषद: नचिकेता और यम का संवाद

यह उपनिषद सबसे रोमांचक है। इसमें बालक नचिकेता यमराज से मृत्यु का रहस्य पूछता है। यमराज उसे धन, अप्सराएँ और स्वर्ग का लालच देते हैं, लेकिन नचिकेता अडिग रहता है। अंत में यमराज उसे ‘आत्मा’ का ज्ञान देते हैं और कहते हैं:
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” (उठो, जागो और श्रेष्ठ महापुरुषों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो)।

2.4 मुंडक उपनिषद: सत्यमेव जयते

इसी उपनिषद से भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य “सत्यमेव जयते” लिया गया है। यह ‘परा’ (आध्यात्मिक) और ‘अपरा’ (लौकिक) विद्या के बीच अंतर स्पष्ट करता है। इसमें जीव और ईश्वर की तुलना दो पक्षियों से की गई है जो एक ही वृक्ष पर बैठे हैं—एक फल खाता है (जीव) और दूसरा केवल देखता है (साक्षी ईश्वर)।

(इसी प्रकार अन्य 6 उपनिषदों—मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, प्रश्न, छांदोग्य, बृहदारण्यक का विस्तृत वर्णन…)


अध्याय 3: ब्रह्म (Brahman) – परम सत्य का महाविज्ञान

उपनिषदों का मुख्य प्रतिपाद्य विषय ‘ब्रह्म’ है।

3.1 ब्रह्म का स्वरूप: निराकार और साकार

ब्रह्म वह है जो ‘बृंह’ (बढ़ना) धातु से बना है, जो अनंत रूप से विस्तृत है।

  1. निर्गुण ब्रह्म (Nirguna): यह गुणों, रूपों और सीमाओं से परे है। इसे केवल ‘नेति-नेति’ (यह नहीं, वह नहीं) कहकर ही संकेत दिया जा सकता है।
  2. सगुण ब्रह्म (Saguna): जब ब्रह्म माया के साथ मिलता है, तो वह ‘ईश्वर’ या सृष्टिकर्ता कहलाता है।

3.2 सच्चिदानंद की अवधारणा

ब्रह्म को तीन शब्दों में परिभाषित किया गया है:

  • सत् (Sat): जो त्रिकाल अबाधित है (जो हमेशा था, है और रहेगा)।
  • चित् (Chit): जो परम चेतना है।
  • आनंद (Ananda): जो असीम सुख का सागर है।

अध्याय 4: आत्मा और जीव – स्वयं की खोज

उपनिषद दर्शन का सबसे बड़ा चमत्कार है—ब्रह्म और आत्मा का अभेद।

4.1 “अहं ब्रह्मास्मि” का रहस्य

जब ऋषि कहते हैं “मैं ब्रह्म हूँ”, तो वे अहंकार की घोषणा नहीं कर रहे होते। वे उस ‘अहं’ की बात कर रहे हैं जो शरीर, मन और बुद्धि से परे शुद्ध चेतना है।

4.2 मांडूक्य उपनिषद और चेतना की चार अवस्थाएँ

मनुष्य का अस्तित्व चार स्तरों पर है:

  1. वैश्वानर (जाग्रत): बाहरी जगत का अनुभव।
  2. तैजस (स्वप्न): मानसिक कल्पनाओं का अनुभव।
  3. प्राज्ञ (सुषुप्ति): गहरी नींद जहाँ कोई विषय नहीं होता।
  4. तुरीय (Turiya): यह शुद्ध आत्मा है। यह न तो जाग्रत है, न स्वप्न। यह शांत, शिव और अद्वैत है। यही ‘ओम’ (AUM) का चतुर्थ पाद है।

अध्याय 5: माया और जगत का प्रपंच

ब्रह्म सत्य है, तो यह संसार क्या है? यहाँ माया की अवधारणा आती है।

5.1 माया क्या है?

माया वह शक्ति है जो “जो नहीं है उसे दिखाती है” (या मा सा माया)। यह रस्सी में साँप का भ्रम पैदा कर देती है। संसार मिथ्या नहीं है, बल्कि ‘सापेक्षिक’ है। जैसे सपने में सब सच लगता है, वैसे ही अज्ञान की स्थिति में जगत सत्य लगता है, लेकिन आत्मज्ञान होते ही केवल ब्रह्म शेष बचता है।


अध्याय 6: तैत्तिरीय उपनिषद और पंचकोश विवेक

मनुष्य केवल एक शरीर नहीं है, वह पांच परतों (कोशों) में लिपटा हुआ है:

  1. अन्नमय कोश: भोजन से बना स्थूल शरीर।
  2. प्राणमय कोश: श्वास और ऊर्जा।
  3. मनोमय कोश: विचार और भावनाएँ।
  4. विज्ञानमय कोश: बुद्धि और विवेक।
  5. आनंदमय कोश: आत्मा के सबसे निकट की परत।

ज्ञान का मार्ग इन पाँचों परतों को भेदकर भीतर बैठे ‘साक्षी’ तक पहुँचने का मार्ग है।


अध्याय 7: उपनिषदों के महावाक्य (The Great Sayings)

संपूर्ण उपनिषदों का निचोड़ इन 4 महावाक्यों में है:

  1. प्रज्ञानं ब्रह्म: चेतना ही ब्रह्म है (ऐतरेय उपनिषद)।
  2. अहं ब्रह्मास्मि: मैं ब्रह्म हूँ (बृहदारण्यक उपनिषद)।
  3. तत्त्वमसि: तुम वही (ब्रह्म) हो (छांदोग्य उपनिषद)।
  4. अयमात्मा ब्रह्म: यह आत्मा ही ब्रह्म है (मांडूक्य उपनिषद)।

अध्याय 8: आधुनिक युग में उपनिषदों की प्रासंगिकता

8.1 विज्ञान और उपनिषद

आज का क्वांटम फिजिक्स (Quantum Physics) उपनिषदों के करीब आ रहा है। जैसे उपनिषद कहते हैं कि सब कुछ एक ही ‘ऊर्जा’ (ब्रह्म) है, वैसे ही विज्ञान कहता है कि पदार्थ (Matter) केवल ऊर्जा का एक रूप है। एरविन श्रोडिंगर जैसे महान वैज्ञानिक उपनिषदों के प्रशंसक थे।

8.2 मानसिक शांति और मनोविज्ञान

तनाव और अवसाद के युग में, उपनिषदों का “साक्षी भाव” (Observing without attaching) सबसे बड़ी चिकित्सा है। यह हमें सिखाता है कि हम अपने विचार नहीं हैं, हम उन विचारों को देखने वाले ‘द्रष्टा’ हैं।


अध्याय 9: उपनिषद और वैश्विक विचार

जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर ने कहा था: “उपनिषदों का अध्ययन मेरे जीवन की सांत्वना रहा है, और यही मेरी मृत्यु की सांत्वना होगा।”
अमेरिका के एमर्सन और थोरो जैसे विचारकों ने उपनिषदों के आधार पर ‘Transcendentalism’ की नींव रखी। यह दर्शन सीमाओं को तोड़कर ‘वैश्विक नागरिक’ बनने की प्रेरणा देता है।


अध्याय 10: निष्कर्ष – ब्रह्म की ओर वापसी

उपनिषद हमें “तमसो मा ज्योतिर्गमय” (अंधेरे से प्रकाश की ओर) ले जाने वाले मार्ग हैं। यह दर्शन किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि पूरी मानवता का है। यह हमें बताता है कि हम तुच्छ शरीर नहीं, बल्कि उस अनंत सागर की एक लहर हैं जिसका नाम ब्रह्म है।

जैसे ही हम उपनिषदों के ज्ञान को जीवन में उतारते हैं, भय समाप्त हो जाता है, क्योंकि हमें पता चलता है कि “मृत्यु केवल शरीर की होती है, मेरी (आत्मा की) नहीं।”

“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”
(वह पूर्ण है, यह भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है और पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष बचता है।)


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  • Post Benefit: यह लेख छात्रों, दर्शनशास्त्र के शोधकर्ताओं और शांति की तलाश करने वाले सामान्य पाठकों के लिए एक “ज्ञान का खजाना” है।

लेखक की कलम से:
ब्रह्मज्ञान का यह मार्ग कठिन अवश्य है, लेकिन यही एकमात्र मार्ग है जो हमें पूर्णता प्रदान करता है। उपनिषदों की शरण में आइए और अपने भीतर के उस प्रकाश को पहचानिए जो सूरज से भी अधिक तेजस्वी है।

साभार: श्री पुनाराम साहू सर के मार्गदर्शन में संकलित।

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