भूमिका: निर्धनता—एक वैश्विक और राष्ट्रीय चुनौती
निर्धनता केवल धन का अभाव नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा और बुनियादी अधिकारों से वंचित रहने की एक अवस्था है। किसी भी राष्ट्र के लिए ‘विकसित’ होने का सपना तब तक अधूरा है जब तक उसका अंतिम नागरिक अभाव की बेड़ियों में जकड़ा हो। भारत, जो विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, आज भी निर्धनता की जटिल समस्या से जूझ रहा है।
इस वृहद् लेख में हम निर्धनता के वैज्ञानिक अर्थ, कैलोरी मापदण्ड, ऐतिहासिक समितियों (जैसे तेंदुलकर और रंगराजन), बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) और सरकार द्वारा उठाए गए क्रांतिकारी कदमों का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
भाग 1: निर्धनता का अर्थ और परिभाषा
सरल शब्दों में, निर्धनता वह सामाजिक-आर्थिक स्थिति है जिसमें समाज का एक वर्ग अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं (भोजन, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य) को पूरा करने में असमर्थ होता है।
- सामूहिक निर्धनता: जब समाज का एक बड़ा भाग न्यूनतम जीवन निर्वाह स्तर से नीचे रहता है, तो उसे सामूहिक निर्धनता की स्थिति कहा जाता है।
- न्यूनतम उपभोग मानक: विशेषज्ञों के अनुसार, निर्धनता का अनुमान उस न्यूनतम आय या व्यय से लगाया जाता है जो एक व्यक्ति को जीवित रहने और कार्य करने के लिए अनिवार्य है।
भाग 2: निर्धनता के प्रमुख प्रकार (Classification of Poverty)
अर्थशास्त्र में निर्धनता को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है:
2.1 पूर्ण निर्धनता (Absolute Poverty)
इसका अर्थ है देश की आर्थिक स्थिति के आधार पर निर्धनता का एक निरपेक्ष माप। इसमें एक ‘न्यूनतम उपभोग स्तर’ (जैसे कैलोरी की मात्रा) निर्धारित की जाती है। जो लोग इस स्तर से नीचे होते हैं, उन्हें ‘पूर्णतः निर्धन’ माना जाता है। भारत जैसे विकासशील देशों में इसी मापदण्ड का अधिक प्रयोग होता है।
2.2 सापेक्ष निर्धनता (Relative Poverty)
सापेक्ष निर्धनता का अर्थ है आय की असमानता। यह विभिन्न आय समूहों, क्षेत्रों या देशों के बीच तुलनात्मक अध्ययन है।
- UNO के अनुसार: वे देश निर्धन हैं जिनकी प्रति व्यक्ति आय $725 से कम है।
- तुलना: जहाँ अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय $25,800 से अधिक है, वहीं भारत की स्थिति वैश्विक स्तर पर ‘सापेक्ष रूप से’ अभी भी सुधार की प्रक्रिया में है।
भाग 3: भारत में निर्धनता मापन के मापदण्ड
भारत में निर्धनता मापने के लिए समय-समय पर विभिन्न मापदण्ड अपनाए गए हैं।
3.1 कैलोरी मापदण्ड (Calorie Criteria)
यह विचार सर्वप्रथम लॉर्ड बॉयड ऑयर (FAO) ने दिया था। भारत में योजना आयोग ने इसे अपनाया:
- ग्रामीण क्षेत्र: 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन।
- शहरी क्षेत्र: 2100 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन।
- तर्क: ग्रामीण क्षेत्रों में शारीरिक श्रम अधिक होता है, इसलिए वहाँ अधिक ऊर्जा (कैलोरी) की आवश्यकता होती है।
3.2 न्यूनतम उपभोग व्यय मापदण्ड
आय के स्थान पर उपभोग व्यय (Consumption Expenditure) को आधार बनाया जाता है।
- 1960-61: ₹20 प्रति माह निजी उपभोग व्यय को न्यूनतम माना गया था।
- 1993-94: NSSO के अनुसार गाँवों और शहरों के लिए इसे बढ़ाकर ₹229 के स्तर पर समायोजित किया गया।
भाग 4: निर्धनता रेखा (Poverty Line) क्या है?
निर्धनता रेखा वह काल्पनिक सीमा है जो उस न्यूनतम ‘क्रय शक्ति’ (Purchasing Power) को दर्शाती है जिससे एक व्यक्ति अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सके।
- BPL (Below Poverty Line): निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोग।
- APL (Above Poverty Line): निर्धनता रेखा से ऊपर रहने वाले लोग।
- निर्धारण: भारत में इसका निर्धारण मुख्य रूप से प्रति व्यक्ति औसत मासिक व्यय के आधार पर किया जाता है।
भाग 5: निर्धनता आकलन हेतु प्रमुख समितियाँ
5.1 लकड़ावाला समिति (1993)
प्रो. डी.टी. लकड़ावाला की अध्यक्षता में इस दल ने प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग निर्धनता रेखा (कुल 35) निर्धारित करने का सुझाव दिया, जो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित थी।
5.2 तेंदुलकर समिति (2009)
इस समिति ने कैलोरी मॉडल को छोड़कर स्वास्थ्य और शिक्षा पर होने वाले निजी खर्च को भी निर्धनता मापन में शामिल किया।
5.3 रंगराजन समिति (2012-2014)
इस समिति ने निर्धनता रेखा को और अधिक वैज्ञानिक बनाया:
- शहरी क्षेत्र: ₹47 प्रति व्यक्ति प्रतिदिन (₹1407 प्रति माह)।
- ग्रामीण क्षेत्र: ₹32 प्रति व्यक्ति प्रतिदिन (₹972 प्रति माह)।
- परिणाम: इस आधार पर 2011-12 में भारत की 29.5% जनसंख्या गरीब मानी गई।
भाग 6: बहुआयामी निर्धनता सूचकांक (MPI) – 10 प्रमुख संकेतक
केवल आय की कमी गरीबी नहीं है। UNDP और OPHI द्वारा विकसित MPI गरीबी को तीन आयामों और 10 संकेतकों में मापता है:
- शिक्षा (1/6 भारांकन): स्कूली शिक्षा के वर्ष और स्कूल में उपस्थिति।
- स्वास्थ्य (1/6 भारांकन): बाल मृत्यु दर और पोषण।
- जीवन स्तर (1/6 भारांकन): इसमें 6 संकेतक हैं—बिजली, पेयजल, स्वच्छता, फर्श (मिट्टी का या पक्का), खाना पकाने का ईंधन (उपले या गैस), और संपत्ति (TV, साइकिल आदि)।
भारत की स्थिति: 2006 से 2016 के बीच भारत ने रिकॉर्ड 27 करोड़ लोगों को बहुआयामी गरीबी से बाहर निकाला है, जो एक वैश्विक कीर्तिमान है।
भाग 7: भारत में निर्धनता के उत्तरदायी कारक
भारत में गरीबी के जड़ें गहरी हैं, जिसके लिए निम्नलिखित कारक जिम्मेदार हैं:
- जनसंख्या विस्फोट: प्रति वर्ष 1.7 करोड़ नए लोग जुड़ने से संसाधनों पर दबाव बढ़ता है।
- कृषि उत्पादकता में कमी: खेतों का छोटा आकार और पुरानी तकनीक के कारण किसान केवल निर्वाह स्तर पर रह पाते हैं।
- बेरोजगारी: श्रम शक्ति की वृद्धि दर की तुलना में रोजगार के अवसरों का कम सृजन।
- महंगाई (Inflation): खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती कीमतों का सबसे बुरा असर गरीबों पर पड़ता है।
- सामाजिक कारक: जाति प्रथा, उत्तराधिकार के जटिल नियम और रूढ़िवादी रीति-रिवाज आर्थिक विकास में बाधक हैं।
- पूंजी का अभाव: निर्धनता के दुष्चक्र (Vicious Circle of Poverty) के कारण गरीब व्यक्ति बचत और निवेश नहीं कर पाता।
भाग 8: निर्धनता उन्मूलन के उपाय और सरकारी योजनाएं
सरकार ने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे को हकीकत में बदलने के लिए कई रणनीतियाँ अपनाई हैं:
- रोजगार सृजन:
- MGNREGA: ग्रामीण क्षेत्रों में 100 दिनों के रोजगार की गारंटी।
- SGSY: ग्रामीण स्वरोजगार कार्यक्रम।
- वित्तीय समावेशन:
- प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY): गरीबों को बैंकिंग तंत्र से जोड़ना और सीधा लाभ हस्तांतरण (DBT)।
- बुनियादी ढांचा और आवास:
- प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY): पक्के घर की सुविधा।
- उज्ज्वला योजना: मुफ्त LPG कनेक्शन (धुएँ से मुक्ति)।
- स्वास्थ्य और पोषण:
- आयुष्मान भारत: ₹5 लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम: सस्ते गल्ले की दुकानों से अनाज वितरण।
- शिक्षा का प्रसार: निःशुल्क पुस्तकें, छात्रवृत्ति और कौशल विकास मिशन।
भाग 9: नीति आयोग की रणनीति (Vision 2032)
नीति आयोग ने 2017 में एक ‘विज़न डॉक्यूमेंट’ पेश किया जिसका लक्ष्य 2032 तक गरीबी को जड़ से खत्म करना है।
- तीन चरण: गरीबों की सही गणना, प्रभावी योजनाओं का क्रियान्वयन और निरंतर मॉनिटरिंग।
- MSME क्षेत्र: आयोग का मानना है कि लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर 8 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी से निकाला जा सकता है।
भाग 10: निष्कर्ष और भविष्य की राह
भारत ने निर्धनता अनुपात को कम करने में अविश्वसनीय प्रगति की है, लेकिन चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई है। ग्रामीण भारत में आज भी 26% आबादी गरीब है। हमें केवल आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) पर ही नहीं, बल्कि समावेशी समृद्धि (Inclusive Prosperity) पर ध्यान देना होगा।
अपेक्षित कदम:
- कृषि को मानसून की अनिश्चितता से बचाना और सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना।
- शिक्षा और स्वास्थ्य को ‘मुनाफे’ के बजाय ‘अधिकार’ के रूप में सुदृढ़ करना।
- अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई (Income Gap) को पाटने के लिए प्रगतिशील कर प्रणाली लागू करना।
जब तक भारत का अंतिम व्यक्ति शिक्षित, स्वस्थ और आत्मनिर्भर नहीं होगा, तब तक हमारी विकास गाथा अधूरी रहेगी।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) – Google Ranking के लिए
1. भारत में वर्तमान में गरीबी रेखा क्या है?
भारत में गरीबी रेखा का निर्धारण नीति आयोग (पूर्व में योजना आयोग) द्वारा उपभोग व्यय के आधार पर किया जाता है। रंगराजन समिति के अनुसार, शहरी क्षेत्रों के लिए ₹47 और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ₹32 प्रतिदिन का व्यय गरीबी रेखा है।
2. बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) कौन जारी करता है?
वैश्विक स्तर पर इसे UNDP और OPHI द्वारा जारी किया जाता है, जबकि भारत में इसे नीति आयोग ‘राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक’ के रूप में जारी करता है।
3. ‘गरीबी का दुष्चक्र’ (Vicious Circle of Poverty) सिद्धांत किसने दिया?
यह सिद्धांत प्रसिद्ध अर्थशास्त्री रैगनर नर्क्से (Ragnar Nurkse) ने दिया था।
4. MGNREGA गरीबी दूर करने में कैसे सहायक है?
यह अकुशल श्रमिकों को कानूनी रूप से रोजगार की गारंटी देता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम आय सुनिश्चित होती है और पलायन कम होता है।
5. क्या केवल प्रति व्यक्ति आय से गरीबी का सही अंदाजा लगाया जा सकता है?
नहीं, प्रति व्यक्ति आय केवल औसत बताती है। गरीबी के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, और जीवन स्तर (MPI) का विश्लेषण अनिवार्य है।
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